श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.19.20 
न वा इदं राजर्षिवर्य चित्रं
भवत्सु कृष्णं समनुव्रतेषु ।
येऽध्यासनं राजकिरीटजुष्टं
सद्यो जहुर्भगवत्पार्श्वकामा: ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
(मुनियों ने कहा :) हे भगवान श्रीकृष्ण की परंपरा का पालन करने वाले पांडव राजाओं के श्रेष्ठ! यह बिल्कुल भी आश्चर्य की बात नहीं है कि आप अपना वह सिंहासन, जो अनेक राजाओं के मुकुटों से सुशोभित है, भगवान के सदा साथ रहने के लिए त्याग रहे हैं।
 
(The sages said:) O chief of the kings of the Pandu dynasty, who follow the tradition of Lord Krishna! It is not surprising at all that you are renouncing your throne, which is decorated with the crowns of many kings, to attain the eternal proximity of the Lord.
तात्पर्य
मूर्ख राजनेता जो राज्य प्रशासनिक पदों पर विराजमान होते हैं वे सोचते हैं कि उनके पास जो अस्थायी पद हैं वे जीवन का सबसे बड़ा भौतिक लाभ है और इसलिए जीवन के अंतिम क्षण तक भी वे उन्हीं पदों पर जमे रहते हैं, यह जाने बिना कि भगवान के शाश्वत निवास में, उनके सहयोगियों में से एक के रूप में मुक्ति प्राप्त करना - यही जीवन का सबसे बड़ा लाभ है। मानव जीवन इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए है। भगवान ने हमें भगवद-गीता में कई बार भरोसा दिलाया है कि भगवद-धाम, उनके शाश्वत निवास में वापस जाना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। प्रह्लाद महाराज ने भगवान नृसिंह से प्रार्थना करते हुए कहा, "हे मेरे प्रभु, मैं भौतिकवादी जीवन शैली से बहुत डरता हूँ और मैं आपके नृसिंह-देव के रूप में वर्तमान घोर क्रूर रूप से जरा भी नहीं डरता। यह भौतिकवादी जीवन शैली चक्की के पाट की तरह है, जिसमे हम कुचले जा रहे हैं। हम जीवन की उफनती लहरों के इस भयानक भँवर में गिर गए हैं और इसलिए, हे प्रभु, मैं आपके चरण कमलों की पूजा करता हूँ और विनती करता हूँ कि आप मुझे वापस अपने शाश्वत निवास में बुलाएँ और मुझे अपने सेवकों में से एक बनाएँ। यह भौतिकवादी जीवन शैली की सर्वोच्च मुक्ति है। भौतिकवादी जीवन शैली के बारे में मेरा बहुत कड़वा अनुभव है। अपने कर्मों के प्रभाव से जिस भी प्रजाति में जन्मा हूँ, मैंने बहुत दुख के साथ दो चीजों का अनुभव किया है, अर्थात् अपने प्रियजनों से अलगाव और अनचाही चीजों से मिलना। और उनका मुकाबला करने के लिए, मैंने जो उपाय किए वे स्वयं रोग से अधिक खतरनाक थे। इसलिए जन्म के बाद जन्म, मैं एक बिंदु से दूसरे बिंदु पर भटकता रहता हूँ और इसलिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे अपने चरण कमलों में शरण दें।"

पाण्डव राजा, जो दुनिया के कई संतों से भी श्रेष्ठ हैं, भौतिकवादी जीवन शैली के कड़वे परिणाम जानते थे। सिंहासन की चकाचौंध ने उन्हें कभी नहीं मोहा, और वे हमेशा भगवान से अनंत काल तक उनके साथ रहने के लिए बुलाए जाने का अवसर तलाशते थे। महाराज परीक्षित, महाराज युधिष्ठिर के योग्य पौत्र थे। महाराज युधिष्ठिर ने सिंहासन अपने पौत्र को सौंप दिया, और इसी तरह महाराज युधिष्ठिर के पौत्र महाराज परीक्षित ने सिंहासन अपने पुत्र जनमेजय को सौंप दिया। वंश में सभी राजाओं का यही तरीका है क्योंकि वे सभी भगवान कृष्ण की सीधी श्रृंखला में हैं। इस प्रकार, भगवान के भक्त कभी भी भौतिकवादी जीवन की चकाचौंध से मोहित नहीं होते हैं, और वे निष्पक्ष रूप से, भौतिकवादी जीवन की झूठी, भ्रामक वस्तुओं से अनकटे हुए रहते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)