पाण्डव राजा, जो दुनिया के कई संतों से भी श्रेष्ठ हैं, भौतिकवादी जीवन शैली के कड़वे परिणाम जानते थे। सिंहासन की चकाचौंध ने उन्हें कभी नहीं मोहा, और वे हमेशा भगवान से अनंत काल तक उनके साथ रहने के लिए बुलाए जाने का अवसर तलाशते थे। महाराज परीक्षित, महाराज युधिष्ठिर के योग्य पौत्र थे। महाराज युधिष्ठिर ने सिंहासन अपने पौत्र को सौंप दिया, और इसी तरह महाराज युधिष्ठिर के पौत्र महाराज परीक्षित ने सिंहासन अपने पुत्र जनमेजय को सौंप दिया। वंश में सभी राजाओं का यही तरीका है क्योंकि वे सभी भगवान कृष्ण की सीधी श्रृंखला में हैं। इस प्रकार, भगवान के भक्त कभी भी भौतिकवादी जीवन की चकाचौंध से मोहित नहीं होते हैं, और वे निष्पक्ष रूप से, भौतिकवादी जीवन की झूठी, भ्रामक वस्तुओं से अनकटे हुए रहते हैं।
