श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.19.19 
महर्षयो वै समुपागता ये
प्रशस्य साध्वित्यनुमोदमाना: ।
ऊचु: प्रजानुग्रहशीलसारा
यदुत्तमश्लोकगुणाभिरूपम् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
वहाँ पर जमा हुए सभी ऋषियों ने भी महाराज परीक्षित के फैसले की सराहना की और "बहुत अच्छा (साधु-साधु)" कहकर अपनी सहमति व्यक्त की। स्वभाव से ही, मुनिगण सामान्य लोगों का भला करने के लिए उन्मुख रहते हैं, क्योंकि उनमें परमेश्वर के सभी गुण विद्यमान होते हैं। इसलिए, वे भगवान के भक्त, महाराज परीक्षित को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले।
 
All the sages assembled there also appreciated Maharaja Pariksit's decision and expressed their approval by saying, "Very good (sadhu-sadhu). By nature, sages are inclined towards the welfare of ordinary people because they have all the qualities of the Supreme Lord. Therefore, they were very pleased to see Maharaja Pariksit, a devotee of the Lord, and spoke as follows.
तात्पर्य
एक जीव की नैसर्गिक सुंदरता भक्तिमय सेवा के मंच पर उठने से बढ़ जाती है। महाराज परीक्षित भगवान कृष्ण के प्रति आसक्ति में तल्लीन थे। यह देखकर, वहां एकत्रित महान ऋषि अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने "बहुत अच्छा" कहकर अपनी स्वीकृति व्यक्त की। ऐसे ऋषि स्वाभाविक रूप से आम आदमी का भला करने के लिए इच्छुक होते हैं, और जब वे महाराज परीक्षित जैसे व्यक्तित्व को भक्ति सेवा में उन्नति करते देखते हैं, तो उनकी खुशी की कोई सीमा नहीं रहती है, और वे अपनी शक्ति के अनुसार सभी आशीर्वाद प्रदान करते हैं। प्रभु की भक्ति सेवा इतनी शुभ होती है कि सभी देवता और ऋषि, स्वयं भगवान तक, भक्त से प्रसन्न हो जाते हैं, और इसलिए भक्त को सब कुछ शुभ मिलता है। एक प्रगतिशील भक्त के मार्ग से सभी अशुभ चीजें हट जाती हैं। मृत्यु के समय महान ऋषियों से मिलना निश्चित रूप से महाराज परीक्षित के लिए शुभ था, और इस प्रकार उन्हें एक ब्राह्मण के लड़के के तथाकथित शाप का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)