प्रायश: साधवो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिता: ।
न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्माऽगुणाश्रय: ॥ ५० ॥
अनुवाद
आमतौर पर अध्यात्मवादी, भले ही संसार के द्वंद्वों में दूसरों द्वारा लगाए जाते हैं, वे व्यथित नहीं होते हैं। और न ही वे (सांसारिक वस्तुओं में) आनंद लेते हैं, क्योंकि वे आध्यात्मिक गतिविधियों में ही व्यस्त रहते हैं।
Generally, spiritualists do not get distressed even when others engage them in worldly conflicts. Nor do they take pleasure (in worldly things) because they remain engaged in spirituality.
तात्पर्य
अतिवादियों का ऐम अनुभवसिध्द दार्शनिक, रहस्यवादी और प्रभु के भक्त हैं। अनुभवसिध्द दार्शनिक निरपेक्ष के होने में विलीन होने की पूर्णता का उद्देश्य रखते हैं, रहस्यवादी सर्व-व्याप्त परमात्मा को देखने का उद्देश्य रखते हैं, और भगवान के भक्त ईश्वर के व्यक्तित्व की दिव्य प्रेमपूर्ण सेवा में लगे हुए हैं। चूंकि ब्रह्म, परमात्मा और भगवान एक ही परम तत्त्व के विभिन्न चरण हैं, सभी अतिवादी भौतिक प्रकृति के तीनों रूपों से परे हैं। भौतिक कष्ट और सुख तीनों रूपों के उत्पाद हैं, और इसलिए ऐसे भौतिक कष्ट और सुख के कारणों का अतिवादियों से कोई लेना-देना नहीं है। राजा एक भक्त था, और ऋषि एक रहस्यवादी था। इसलिए दोनों ही सर्वोच्च इच्छा द्वारा निर्मित आकस्मिक घटना से असंपृक्त थे। चंचल बच्चा भगवान की इच्छा को पूरा करने का एक साधन था।
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध एक के अंतर्गत अठारहवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥