मुनि ने अपने पुत्र के किए पाप के लिए खेद प्रकट करते हुए पश्चाताप किया और राजा द्वारा किए गए अपमान को दिल पर नहीं लिया।
In this way the sage repented for the sin committed by his son. He did not take the insult done by the king seriously.
तात्पर्य
घटना अब साफ हो चुकी है। महाराजा परीक्षित का ऋषि को मरे हुए साँप की माला पहनाना इतना गंभीर अपराध नहीं था, जितना कि श्रृंगी का राजा को शाप देना। गंभीर अपराध केवल मूर्ख बालक ने किया था; इसलिए वह परमेश्वर द्वारा क्षमा किये जाने का पात्र था, यद्यपि पाप के प्रभाव से मुक्त होना संभव नहीं था। महाराजा परीक्षित को भी मूर्ख ब्राह्मण द्वारा दिए गए शाप की कोई चिंता नहीं थी। इसके विपरीत, उन्होंने उस अजीब स्थिति का पूरा लाभ उठाया और भगवान की महान इच्छा के द्वारा महाराजा परीक्षित ने श्रील शुकदेव गोस्वामी की कृपा से जीवन की सबसे बड़ी पूर्णता प्राप्त की। वास्तव में यह भगवान की इच्छा थी, और महाराजा परीक्षित, ऋषि शमिक और उनके पुत्र श्रृंगी सभी भगवान की इच्छा को पूरा करने में सहायक थे। इसलिए उनमें से कोई भी मुश्किल में नहीं पड़ा क्योंकि सब कुछ परम व्यक्ति के संदर्भ में किया गया था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥