तब ऋषि ने सर्वव्यापी भगवान् से अपने नाबालिग और मूर्ख पुत्र को क्षमा करने की प्रार्थना की, जिसने ऐसे व्यक्ति को शाप देने का महापाप किया था, जो सभी पापों से मुक्त था और पराश्रित एवं सभी प्रकार से रक्षा किये जाने के योग्य था।
The sage then prayed to the omnipresent Lord to forgive his immature and unwise son, who had committed the great sin of cursing a person who was free from all sins and was worthy of being dependent and protected in every way.
तात्पर्य
प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों के प्रति स्वयं उत्तरदाई है, चाहे वह धार्मिक हो या पापमय। ऋषि शमीक यह पूर्वानुमान लगा सकते थे कि उनके पुत्र ने महाराज परीक्षित को श्राप देकर बहुत बड़ा पाप किया था, जिनकी ब्राह्मणों द्वारा रक्षा की जानी थी, क्योंकि वह एक धार्मिक शासक थे और भगवान के प्रथम श्रेणी के भक्त होने के कारण सभी पापों से पूर्ण रूप से मुक्त थे। जब भगवान के भक्त के लिए कोई अपराध किया जाता है, तो प्रतिक्रिया को दूर करना बहुत मुश्किल होता है। ब्राह्मण, सामाजिक व्यवस्था के शीर्ष पर होने के कारण, अपने अधीनस्थों को सुरक्षा देने के लिए हैं, न कि उन्हें श्राप देने के लिए। ऐसे अवसर होते हैं जब एक ब्राह्मण उग्र रूप से किसी अधीनस्थ क्षत्रिय या वैश्य आदि को श्राप दे सकता है, लेकिन महाराज परीक्षित के मामले में कोई आधार नहीं था, जैसा कि पहले ही बताया गया है। मूर्ख लड़के ने ब्राह्मण के पुत्र होने का घमंड करके ऐसा किया था, और इस प्रकार वह ईश्वर के नियम द्वारा दंडित किए जाने के लिए उत्तरदायी बन गया। भगवान कभी भी उस व्यक्ति को माफ नहीं करते जो उनके शुद्ध भक्त की निंदा करता है। इसलिए, राजा को श्राप देने से मूर्ख श्रृंगी ने न केवल पाप किया बल्कि सबसे बड़ा अपराध भी किया। इसलिए ऋषि यह भविष्यवाणी कर सकते थे कि केवल भगवान का परम व्यक्तित्व ही उनके पुत्र को उसके पाप कर्म से बचा सकता है। इसलिए उन्होंने सीधे सर्वोच्च भगवान से क्षमा की प्रार्थना की, जो अकेले ही ऐसी चीज़ को पूर्ववत कर सकते हैं जिसे बदलना असंभव है। मुर्ख लड़के के नाम पर अपील की गई थी जिसने अभी तक कोई बुद्धि नहीं विकसित की थी। यहाँ एक प्रश्न उठाया जा सकता है कि चूंकि यह भगवान की इच्छा थी कि परीक्षित महाराज को उस स्थिति में रखा जाए ताकि उन्हें भौतिक अस्तित्व से मुक्त किया जा सके, तो क्यों एक ब्राह्मण पुत्र को इस आपत्तिजनक कार्य के लिए जिम्मेदार ठहराया गया? इसका उत्तर यह है कि आपत्तिजनक कार्य केवल एक बच्चे द्वारा किया गया था ताकि उसे बहुत आसानी से माफ किया जा सके, और इस प्रकार पिता की प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। लेकिन यदि यह प्रश्न उठाया जाए कि ब्राह्मण समुदाय को समग्र रूप से काली को विश्व मामलों में जाने देने के लिए क्यों जिम्मेदार ठहराया गया, तो इसका उत्तर वराह पुराण में दिया गया है कि जो राक्षस भगवान के व्यक्तित्व के प्रति शत्रुतापूर्ण थे, लेकिन भगवान द्वारा नहीं मारे गए थे, उन्हें काली युग का लाभ उठाने के लिए ब्राह्मणों के परिवारों में जन्म लेने की अनुमति दी गई थी। सर्व-दयालु भगवान ने उन्हें पवित्र ब्राह्मणों के परिवारों में जन्म लेने का मौका दिया ताकि वे मोक्ष की ओर बढ़ सकें। लेकिन राक्षसों ने अच्छे अवसर का उपयोग करने के बजाय ब्राह्मण बनने के घमंड में फूलने के कारण ब्राह्मण संस्कृति का दुरुपयोग किया। इसका विशिष्ट उदाहरण श्रृंगी ऋषि का पुत्र है, और ब्राह्मणों के सभी मूर्ख पुत्रों को इसके द्वारा चेतावनी दी जाती है कि वे श्रृंगी की तरह मूर्ख न बनें और अपने पिछले जन्मों में राक्षसी गुणों से हमेशा सावधान रहें। मूर्ख लड़के को निश्चित रूप से भगवान ने माफ कर दिया था, लेकिन अन्य, जिनके पास शमीक ऋषि जैसा पिता नहीं हो सकता है, यदि वे ब्राह्मण परिवार में जन्म द्वारा प्राप्त लाभों का दुरुपयोग करते हैं तो वे बहुत बड़ी मुश्किल में पड़ जाएंगे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥