श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  1.18.34 
ब्राह्मणै: क्षत्रबन्धुर्हि गृहपालो निरूपित: ।
स कथं तद्गृहे द्वा:स्थ: सभाण्डं भोक्तुमर्हति ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
राजा के वंशजों को द्वारपाल कुत्तों के रूप में नियुक्त किया गया है, और उन्हें द्वार पर ही रहना चाहिए। तो फिर वे किस आधार पर घर में घुसकर अपने स्वामी की थाली में खाना खाने का दावा करते हैं?
 
The children of kings are definitely appointed as gatekeeper dogs and they should stay at the gate. So on what basis do these dogs enter the house and claim food from their master's plate?
तात्पर्य
अनुभवहीन ब्राह्मण बालक निश्चित रूप से जानता था कि राजा ने उसके पिता से पानी माँगा था और पिता ने कोई जवाब नहीं दिया | उसने अपने पिता की अतिथिहीनता को असभ्य ढंग से स्पष्ट करने का प्रयास किया जो एक असभ्य बालक पर ही फबता है | राजा के स्वागत न किये जाने पर उसे बिल्कुल भी अफ़सोस नहीं हुआ | इसके विपरीत, उसने गलत कार्य को कलियुग के ब्राह्मणों की विशिष्टता वाले तरीके से उचित ठहराया | उसने राजा की तुलना चौकीदार से की, और इसलिए राजा के लिए एक ब्राह्मण के घर में प्रवेश करना और एक ही लोटे से पानी माँगना ग़लत था | कुत्ते को निश्चित रूप से उसके स्वामी द्वारा पाला जाता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि कुत्ता उसी लोटे में से खाने और पीने का दावा करेगा | झूठी प्रतिष्ठा की यह मानसिकता पूर्ण सामाजिक व्यवस्था के पतन का कारण है, और हम देख सकते हैं कि शुरुआत में इसे एक अनुभवहीन ब्राह्मण के पुत्र ने शुरू किया था | जिस प्रकार कुत्ते को कभी भी कमरे और चूल्हे के भीतर प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जाती है, हालाँकि उसे स्वामी द्वारा पाला जाता है, उसी प्रकार, श्रृंगी के अनुसार, राजा को शमीक ऋषि के घर में प्रवेश करने का कोई अधिकार नहीं था | लड़के की राय के अनुसार, राजा गलत पक्ष में था न कि उसके पिता, और इस प्रकार उसने अपने चुप्पे पिता को सही ठहराया |
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)