श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, यह योजना भगवान की इच्छा के अनुसार हुई, और भगवान की इच्छा के कारण ही निराशा की स्थिति पैदा हुई। योजना यह थी कि उसके तथाकथित गलत कर्म के लिए उस राजा को काली के प्रभाव से ग्रस्त किसी अनुभवहीन ब्राह्मण लड़के द्वारा शाप मिल सके और तब राजा अपने घर और गृहस्थ जीवन को हमेशा के लिए छोड़ दे। श्रील शुकादेव गोस्वामी के साथ उसके संबंध दिव्य श्रीमद भागवत की प्रस्तुति को संभव बनाएंगे, जिसे भगवान के पुस्तक अवतार के रूप में माना जाता है। भगवान की यह पुस्तक अवतार भगवान की अलौकिक लीलाओं की बहुत लुभावनी सूचनाएं देता है, जैसे कि व्रजभूमि की आध्यात्मिक गोपालियों के साथ उसकी रास - लीला। भगवान की यह विशिष्ट लीला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि जो कोई भी भगवान की इस विशेष लीला के बारे में ठीक से जानता है उसे अवश्य ही मूर्खतापूर्ण यौन इच्छाओं से रोक दिया जाएगा और भगवान के लिए पवित्र भक्ति सेवा के मार्ग पर स्थापित किया जाएगा। शुद्ध भक्त की सामान्य निराशा का अर्थ है भक्त को उच्च अलौकिक स्थिति में ऊपर उठाना। अर्जुन और पांडवों को उनके चचेरे भाईयों की साजिश के कारण निराशा में डालकर, कुरुक्षेत्र के युद्ध के शुरू होने की तैयारी भगवान द्वारा की गई थी। यह भगवान के प्रतिनिधि भागवद-गीता के अवतार को ध्वनि के तौर पर प्रस्तुत करने के लिए था। इसलिए राजा परीक्षित को अजीब स्थिति में डालने के द्वारा, श्रीमद-भागवत का अवतार भगवान की इच्छा से बनाया गया था। भूख और प्यास से पीड़ित होना केवल दिखावा था, क्योंकि राजा ने बहुत कुछ सहा था, यहां तक कि अपनी माता के गर्भ में भी। अश्वत्थामा द्वारा छोड़े गए ब्रह्मास्त्र की तेज गर्मी से वह कभी विचलित नहीं हुआ। राजा की व्यथित स्थिति निश्चित ही अभूतपूर्व थी। महाराजा परीक्षित जैसे भक्त भगवान की इच्छा से ऐसी विपत्तियों को सहने के लिए काफी शक्तिशाली होते हैं, और वे कभी विचलित नहीं होते। इस मामले में, स्थिति की योजना भगवान ने ही बनाई थी।
