श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.18.13 
तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिष: ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान के भक्त के साथ क्षण भर का जुड़ाव, स्वर्गलोक की प्राप्ति या सांसारिक मुक्ति प्राप्ति से भी बढ़कर है, भौतिक संपन्नता से जुड़े सांसारिक सुखों की बात तो छोड़ ही दीजिए, जो कि मृत्यु के अधीन हैं।
 
The value of even a moment's association with a devotee of the Lord cannot be compared either with attainment of heaven or with material liberation. Then what about those worldly blessings which are in the form of material prosperity and are meant for mortals?
तात्पर्य
जब कुछ समान बिन्दु हों, तो एक चीज की दूसरे से तुलना करना संभव है। शुद्ध भक्त की साधना की किसी भौतिक चीज से तुलना नहीं की जा सकती। भौतिक सुख के आदी लोग चंद्रमा, शुक्र और इंद्रलोक जैसे स्वर्गीय ग्रहों तक पहुँचने की आकांक्षा रखते हैं, और जो भौतिक दार्शनिक अटकलों में उन्नत हैं, वे सभी भौतिक बंधनों से मुक्ति की आकांक्षा रखते हैं। जब कोई सभी प्रकार की भौतिक उन्नति से निराश हो जाता है, तो वह विपरीत प्रकार की मुक्ति की इच्छा करता है, जिसे अपुनर-भाव, या कोई पुनर्जन्म नहीं कहा जाता है। परन्तु प्रभु के शुद्ध भक्त स्वर्गीय राज्य में प्राप्त होने वाले सुख की आकांक्षा नहीं करते हैं, न ही वे भौतिक बंधन से मुक्ति की आकांक्षा करते हैं। दूसरे शब्दों में, प्रभु के शुद्ध भक्तों के लिए स्वर्गीय ग्रहों में प्राप्त होने वाले भौतिक सुख मायाजाल की तरह हैं, और क्योंकि वे पहले से ही सुख और दुख की सभी भौतिक अवधारणाओं से मुक्त हैं, वे वास्तव में भौतिक दुनिया में भी मुक्त हैं। इसका अर्थ यह है कि प्रभु के शुद्ध भक्त एक पारलौकिक अस्तित्व में लगे हुए हैं, अर्थात् प्रभु की प्रेममयी सेवा में, भौतिक दुनिया और आध्यात्मिक दुनिया दोनों में। जैसे कोई सरकारी नौकर हमेशा एक जैसा होता है, चाहे वह कार्यालय में हो या घर पर या किसी भी स्थान पर, उसी तरह एक भक्त का किसी भी भौतिक चीज से कोई लेना-देना नहीं होता, क्योंकि वह विशेष रूप से प्रभु की पारलौकिक सेवा में लगा रहता है। चूँकि उसका किसी भी भौतिक चीज से कोई लेना-देना नहीं है, तो उसे राजा या अन्य अधिपतियों जैसे भौतिक आशीर्वाद से क्या सुख मिल सकता है, जो शरीर के अंत के साथ शीघ्रता से समाप्त हो जाते हैं? भक्ति सेवा शाश्वत है; इसका कोई अंत नहीं है, क्योंकि यह आध्यात्मिक है। इसलिए, चूँकि एक शुद्ध भक्त की संपत्ति भौतिक संपत्ति से पूरी तरह से भिन्न है, इसलिए दोनों के बीच कोई तुलना नहीं है। सूत गोस्वामी प्रभु के शुद्ध भक्त थे, और इसलिए नैमिषारण्य में ऋषियों के साथ उनका जुड़ाव अद्वितीय है। भौतिक दुनिया में, स्थूल भौतिकवादियों के साथ जुड़ाव निश्चित रूप से निंदनीय है। भौतिकवादी को योषित-संगी कहा जाता है, या वह जो भौतिक उलझन (स्त्रियाँ और अन्य साज-सज्जा) से बहुत जुड़ा हुआ है। ऐसा लगाव सशर्त होता है क्योंकि यह जीवन और समृद्धि के आशीर्वाद को दूर भगाता है। और इसके बिल्कुल विपरीत भागवत-संगी है, या वह जो हमेशा प्रभु के नाम, रूप, गुणों आदि के साथ जुड़ा रहता है। ऐसा जुड़ाव हमेशा वांछनीय है; यह पूजनीय है, यह प्रशंसनीय है, और इसे जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)