ऋषय ऊचु:
सूत जीव समा: सौम्य शाश्वतीर्विशदं यश: ।
यस्त्वं शंससि कृष्णस्य मर्त्यानाममृतं हि न: ॥ ११ ॥
अनुवाद
श्रेष्ठ मुनियों ने कहा: हे सौम्य सूत गोस्वामी! आप अनेक वर्षों तक जिएँ और शाश्वत यश प्राप्त करें, क्योंकि आप भगवान श्रीकृष्ण के कार्यकलापों के विषय में बहुत ही अच्छा बता रहे हैं। यह हमारे जैसे नश्वर प्राणियों के लिए अमृत के समान है।
The great sages said: O gentle Suta Goswami! May you live for many years and attain eternal fame, because you are narrating the activities of Lord Sri Krishna in an excellent manner. For mortal beings like us, this is like nectar.
तात्पर्य
जब हम भगवान के श्रेष्ठ गुणों और क्रियाओं के बारे में सुनते हैं, तो हमें हमेशा भगवान द्वारा स्वयं भगवद्-गीता (4.9) में बोले गए शब्दों को याद रखना चाहिए। उनके कार्य, भले ही वे मानव समाज में करें, सभी श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे सभी भगवान की आध्यात्मिक ऊर्जा से उभार लिए जाते हैं, जो उनकी भौतिक ऊर्जा से अलग है। जैसा कि भगवद्-गीता में कहा गया है, ऐसे कार्यों को दिव्यम कहा जाता है। इसका मतलब है कि वह कार्य नहीं करते हैं या भौतिक ऊर्जा की हिरासत में एक साधारण जीव की तरह जन्म नहीं लेते हैं। न ही उनका शरीर भौतिक है या साधारण जीवों की तरह परिवर्तनशील है। और जो इस तथ्य को समझता है, या तो भगवान से या अधिकृत स्रोतों से, वर्तमान भौतिक शरीर को छोड़ने के बाद उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। ऐसी प्रबुद्ध आत्मा को भगवान के आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश दिया जाता है और भगवान की श्रेष्ठ प्रेममय सेवा में संलग्न होती है। इसलिए, जितना अधिक हम भगवद्-गीता और श्रीमद्-भागवतम में वर्णित अनुसार भगवान की श्रेष्ठ गतिविधियों के बारे में सुनते हैं, उतना ही अधिक हम उनके श्रेष्ठ स्वरूप के बारे में जान सकते हैं और इस प्रकार भगवान की ओर लौटने के मार्ग पर निश्चित प्रगति कर सकते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥