इसलिए, महाराजा परीक्षित ने अपने दादा अर्जुन की तरह, काली की प्रवृत्तियों के लिए रखे गए सभी अवैध सोने को एकत्र किया और इसे श्रीमद-भागवतम के निर्देश के अनुसार संकीर्तन-यज्ञ में नियोजित किया। जैसा कि हमने पहले सुझाव दिया है, किसी के संचित धन को वितरण के लिए तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है, अर्थात् भगवान की सेवा के लिए पचास प्रतिशत, परिवार के सदस्यों के लिए पच्चीस प्रतिशत और व्यक्तिगत आवश्यकताओं के लिए पच्चीस प्रतिशत। संकीर्तन-यज्ञ के माध्यम से भगवान की सेवा के लिए या समाज में आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार के लिए पचास प्रतिशत खर्च करना मानवीय दया का अधिकतम प्रदर्शन है। दुनिया के लोग आम तौर पर आध्यात्मिक ज्ञान के बारे में अंधेरे में होते हैं, खासकर भगवान की भक्ति सेवा के संबंध में, और इसलिए भक्ति सेवा के व्यवस्थित पारलौकिक ज्ञान का प्रचार करना सबसे बड़ी दया है जो कोई भी इस दुनिया में दिखा सकता है। जब प्रत्येक को अपने संचित सोने का पचास प्रतिशत भगवान की सेवा के लिए बलिदान करना सिखाया जाता है, तो निश्चित रूप से तपस्या, स्वच्छता और दया अपने आप ही होती है, और इस तरह धर्म के व्यक्तित्व के खोए हुए तीन पैर अपने आप स्थापित हो जाते हैं। जब पर्याप्त तपस्या, स्वच्छता, दया और सच्चाई होती है, तो स्वाभाविक रूप से धरती माता पूरी तरह से संतुष्ट होती है, और काली के लिए मानव समाज की संरचना में घुसपैठ करने की बहुत कम संभावना होती है।
