श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 17: कलि को दण्ड तथा पुरस्कार  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.17.41 
अथैतानि न सेवेत बुभूषु: पुरुष: क्‍वचित् ।
विशेषतो धर्मशीलो राजा लोकपतिर्गुरु: ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
अतएव, विशेष रूप से राजा, धर्म उपदेशक, लोक नेता, ब्राह्मण तथा संन्यासी जो अपनी भलाई चाहते हैं, उन्हें उपर्युक्त चार अधार्मिक कार्यों के सम्पर्क में कभी नहीं आना चाहिए।
 
Therefore anyone, especially kings, preachers, leaders, brahmins and ascetics who seek their own welfare should never come into contact with the above-mentioned four irreligious activities.
तात्पर्य
ब्राह्मण सभी अन्य जातियों के धार्मिक गुरु होते हैं, और संन्यासी सभी जातियों और समाज के सभी वर्गों के आध्यात्मिक गुरु होते हैं। इसी तरह राजा और जननेता होते हैं जो सभी लोगों के भौतिक कल्याण के लिए जिम्मेदार होते हैं। प्रगतिशील धर्मियों और वे जो जिम्मेदार इंसान हैं या वे जो अपने मूल्यवान मानव जीवन को खत्म नहीं करना चाहते हैं, उन्हें सभी अधार्मिक सिद्धांतों से बचना चाहिए, खासकर महिलाओं के साथ अवैध संबंध। यदि एक ब्राह्मण सच्चा नहीं है, तो एक ब्राह्मण के रूप में उसका सारा दावा तुरंत निरर्थक और व्यर्थ हो जाता है। यदि एक संन्यासी का महिलाओं के साथ अवैध संबंध है, तो एक संन्यासी के रूप में उसका सारा दावा एक ही बार में झूठा हो जाता है। इसी तरह, यदि राजा और जननेता अनावश्यक रूप से गर्व करते हैं या शराब और धूम्रपान के आदी हैं, तो निश्चित रूप से वे जन कल्याणकारी गतिविधियों का निर्वहन करने के लिए अयोग्य हो जाते हैं। सभी धर्मों के लिए सत्यता मूल सिद्धांत है। मानव समाज के चार नेता, अर्थात् संन्यासी, ब्राह्मण, राजा और जननेता, को उनके चरित्र और योग्यता के द्वारा महत्वपूर्ण रूप से परखा जाना चाहिए। इससे पहले कि कोई समाज के आध्यात्मिक या भौतिक गुरु के रूप में स्वीकार किया जा सके, उसे चरित्र के ऊपर बताए गए मानदंडों द्वारा परखा जाना चाहिए। ऐसे जननेता शैक्षणिक योग्यता में कम योग्य हो सकते हैं, लेकिन यह आवश्यक है कि वे मुख्य रूप से चार अयोग्यताओं, अर्थात् जुआ, शराब, वेश्यावृत्ति और पशु वध के संदूषण से मुक्त हों।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)