श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 17: कलि को दण्ड तथा पुरस्कार  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.17.36 
कलिरुवाच
यत्र क्‍व वाथ वत्स्यामि सार्वभौम तवाज्ञया ।
लक्षये तत्र तत्रापि त्वामात्तेषुशरासनम् ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
हे महाराज, चाहे मैं आपकी आज्ञा से कहीं भी रहूँ और किसी भी दिशा में नज़र डालूँ, मुझे आप ही धनुष-बाण लिए दिखाई देंगे।
 
O King, by your order, wherever I may be and wherever I look, I shall see only you with bow and arrow.
तात्पर्य
काली व्यक्तित्व देख सकता था कि महाराज परीक्षित विश्व की सारी भूमियों के सम्राट थे, और इसलिए वे जहाँ भी रहते थे, उन्हें राजा की उसी मनोदशा का सामना करना पड़ता। काली व्यक्तित्व शरारत के लिए था, और महाराज परीक्षित शरारतखोरों, खासकर काली व्यक्तित्व, सभी प्रकार की शरारतों को वश में करने के लिए थे। इसलिए काली व्यक्तित्व के लिए बेहतर होगा कि राजा ने तभी वहीं मार डाला हो, बजाए इसके कि बाद में कहीं और मारा जाए। वह, आखिरकार, राजा के सामने एक समर्पित आत्मा था, और राजा के लिए वही करना था जो आवश्यक था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)