भगवद-गीता (9.23) में स्वयं भगवान इस बात की पुष्टि इस प्रकार करते हैं:
येऽप्यन्यदेवता भक्ताः
यजन्ते श्रद्धयान्विताः
तेऽपि मामेव कौन्तेय
यजन्त्यविधि-पूर्वकम्
"हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य दूसरे देवताओं के लिए जो भी बलि देता है, वह वास्तव में मेरे लिए ही होता है, लेकिन इसे सही समझ के बिना अर्पित किया जाता है।"
तथ्य यह है कि परमेश्वर एक हैं, उनका कोई दूसरा नहीं है। स्वयं प्रभु के अतिरिक्त कोई ईश्वर नहीं है। इस प्रकार परमेश्वर सदा भौतिक सृष्टि से परे हैं। लेकिन बहुत से लोग सूर्य, चंद्रमा और इंद्र जैसे देवताओं की पूजा करते हैं, जो कि केवल परमेश्वर के भौतिक प्रतिनिधि हैं। ये देवता परमेश्वर के अप्रत्यक्ष, गुणात्मक प्रतिनिधि हैं। हालाँकि, एक विद्वान व्यक्ति या भक्त जानता है कि कौन क्या है। इसलिए वह सीधे परमेश्वर की पूजा करता है और भौतिक, गुणात्मक प्रतिनिधियों द्वारा विचलित नहीं होता है। जो लोग इतने विद्वान नहीं हैं, वे ऐसे गुणात्मक, भौतिक प्रतिनिधियों की पूजा करते हैं, लेकिन उनकी पूजा अनियमित होती है क्योंकि यह नियमित नहीं है।
