न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो
धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये ।
ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्ञै-
र्यज्ञेश्वरं यज्ञवितानविज्ञा: ॥ ३३ ॥
अनुवाद
इसलिए, हे अधर्म के मित्र, तुम उस स्थान पर रहने के योग्य नहीं हो जहाँ विद्वान लोग परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए सत्य और धार्मिक नियमों के अनुसार यज्ञ करते हैं।
Therefore, O friend of irreligion, you are not fit to stay in a place where great learned men perform sacrifices in accordance with true and religious rules to please the Supreme Personality of Godhead.
तात्पर्य
यज्ञेश्वर, या भगवान्, सभी प्रकार के यज्ञीय कर्मकांडों के लाभार्थी हैं। इस तरह के यज्ञीय कर्मकांडों को अलग-अलग युगों के लिए शास्त्रों में अलग-अलग रूप से निर्धारित किया गया है। दूसरे शब्दों में, यज्ञ का अर्थ है प्रभु की सर्वोच्चता को स्वीकार करना और इस प्रकार ऐसे कार्य करना जिससे प्रभु सभी प्रकार से संतुष्ट हो सकें। नास्तिक ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते हैं और वे प्रभु की संतुष्टि के लिए कोई भी बलिदान नहीं करते हैं। कोई भी स्थान या देश जहाँ प्रभु की सर्वोच्चता को स्वीकार किया जाता है और इस तरह से यज्ञ किया जाता है, उसे ब्रह्मावर्त कहा जाता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग देश हैं और प्रत्येक देश के पास सर्वोच्च प्रभु को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न प्रकार के बलिदान हो सकते हैं, लेकिन उन्हें प्रसन्न करने का एक केंद्रीय बिंदु भागवतम में बताया गया है, और वह है सत्यता। धर्म का मूल सिद्धांत सत्यता है और सभी धर्मों का अंतिम लक्ष्य प्रभु को संतुष्ट करना है। कलि युग में, बलिदान का सबसे बड़ा सामान्य सूत्र संकीर्तन-यज्ञ है। यह उन विशेषज्ञों की राय है जो यज्ञ की प्रक्रिया के प्रचार को जानते हैं। भगवान चैतन्य ने यज्ञ की इस विधि का प्रचार किया और इस श्लोक से यह समझा जाता है कि कलि के व्यक्तित्व को दूर भगाने और मानव समाज को युग के प्रभाव का शिकार बनने से बचाने के लिए संकीर्तन-यज्ञ की यज्ञीय विधि को कहीं भी और हर जगह किया जा सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥