श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 17: कलि को दण्ड तथा पुरस्कार  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.17.27 
शोचत्यश्रुकला साध्वी दुर्भगेवोज्झिता सती ।
अब्रह्मण्या नृपव्याजा: शूद्रा भोक्ष्यन्ति मामिति ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
अब यह पवित्र, बदकिस्मती से भगवान द्वारा छोड़े जाने के कारण, अपने नेत्रों में आंसू भरकर अपने भविष्य पर विलाप कर रही है, क्योंकि अब उसे नीच जाति के आदमियों द्वारा शासित और भोगा जा रहा है जो शासक होने का दिखावा करते हैं।
 
Now this Sati, unfortunately, being forsaken by the Lord, is lamenting with tears in her eyes about her future (fate), as she is now to be governed and enjoyed by low-caste men pretending to be rulers.
तात्पर्य
क्षत्रिय, यानि जो मनुष्य दुखियों की रक्षा करने के योग्य है, वही राज्य करने के अधिकारी है। अभ्यासहीन हीन श्रेणी के पुरुष अथवा दुखियों की रक्षा की अभिलाषा न रखने वाले लोगों को प्रबंधक के पद पर नहीं बिठाया जा सकता। दुर्भाग्य से कलियुग में हीन श्रेणी के पुरुष अभ्यास के बिना जनता के मत से राजा बन गए हैं और दुखियों की रक्षा करने के स्थान पर ये लोग सबके लिए असहनीय स्थिति उत्पन्न करते हैं। ऐसे राजा अन्यायपूर्वक अपने लिए सुख-सुविधाओं का प्रबंध करके नगरवासियों को असुविधा पहुँचाते हैं, जिससे पवित्र भूमि इस स्वार्थी और क्रूर नीति के कारण अपने पुत्र-पुत्रियों की करुण दशा देखकर रोती है। कलियुग में जगत का यही भविष्य है जब अधर्म प्रधान रूप से फैलेगा। और अधार्मिक प्रवृत्तियों को रोकने के लिए उपयुक्त राजा की अनुपस्थिति में श्रीमद्भागवत के शिक्षा के द्वारा जनता को व्यवस्थित रूप से शिक्षित करने से रिश्वत, कालाबाजारी इत्यादि भ्रष्टाचार का धुंधला वातावरण साफ हो जाएगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)