कुछ विचारक ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि न तो तर्क द्वारा दुःख के कारण का पता लगाया जा सकता है, न ही कल्पना से जाना जा सकता है और न ही शब्दों द्वारा उसे व्यक्त किया जा सकता है। हे राजर्षि, आपकी अपनी बुद्धि से इस सब पर विचार करके, स्वयं निर्णय करें।
There are some thinkers who believe that the cause of suffering cannot be determined by logic, nor can it be known by imagination, nor can it be expressed by words. O King, you should think about all this with your intellect and decide for yourself.
तात्पर्य
वैष्णव, भगवान के भक्त, ऊपर बताए अनुसार, यह जरूर मानते हैं कि परम प्रभु की स्वीकृति के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। वे सर्वोच्च निर्देशक हैं, क्योंकि वे भगवद् गीता (15.15) में पुष्टि करते हैं कि, सर्वव्यापी परमात्मा के रूप में, वे हर किसी के हृदय में रहते हैं और सभी कार्यों पर सतर्कता रखते हैं और सभी गतिविधियों के साक्षी हैं। नास्तिक का तर्क है कि जब तक किसी योग्य न्याय के समक्ष साबित न हो जाए, तब तक किसी को उसके दुष्कर्म के लिए दंडित नहीं किया जा सकता, का खंडन यहाँ इसलिए किया गया है, क्योंकि हम जीवित प्राणी के निरंतर साक्षी और निरंतर साथी को स्वीकार करते हैं। एक जीवित प्राणी वह सब भूल सकता है जो उसने अपने पिछले या वर्तमान जीवन में किया होगा, लेकिन उसे यह जानना होगा कि भौतिक शरीर के उसी पेड़ में, व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा के रूप में परम आत्मा दो पक्षियों की तरह बैठे हैं। उनमें से एक, जीवित प्राणी, पेड़ के फलों का आनंद ले रहा है, जबकि सर्वोच्च प्राणी वहाँ की गतिविधियों का साक्षी है। इसलिए परमात्मा विशेषता, जीवित प्राणी की सभी गतिविधियों का साक्षी है, और केवल उनके निर्देशन में ही जीवित प्राणी यह याद रख सकता है या भूल सकता है कि उसने अतीत में क्या किया होगा। इसलिए, वे सर्वव्यापी अवैयक्तिक ब्रह्म और हर किसी के हृदय में स्थानीयकृत परमात्मा हैं। वे सभी अतीत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता हैं, और उनसे कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता। भक्त इस सच्चाई को जानते हैं, इसलिए वे अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाते हैं, बिना पुरस्कारों के लिए अधिक उत्सुक हुए। इसके अलावा, कोई भी अनुमान या छात्रवृत्ति द्वारा भगवान की प्रतिक्रियाओं का अनुमान नहीं लगा सकता। वह कुछ लोगों को कठिनाई में क्यों डालता है और दूसरों को नहीं? वे वैदिक ज्ञान के सर्वोच्च ज्ञाता हैं, और इस प्रकार वे तथ्यात्मक वेदांती हैं। साथ ही वे वेदांत के संकलक हैं। कोई भी उनसे स्वतंत्र नहीं है, और हर कोई विभिन्न तरीकों से उनकी सेवा में लगा हुआ है। वातानुकूलित अवस्था में, भौतिक प्रकृति के बल पर जीवित प्राणी द्वारा ऐसी सेवाएँ प्रदान की जाती हैं, जबकि मुक्त अवस्था में भगवान की स्वैच्छिक प्रेममय सेवा में आध्यात्मिक प्रकृति द्वारा जीवित प्राणी की मदद की जाती है। उनके कार्यों में कोई असंगति या असंगति नहीं है। सभी परम सत्य के मार्ग पर हैं। भीष्मदेव ने प्रभु के अकल्पनीय कार्यों का सही अनुमान लगाया था। इसलिए, निष्कर्ष यह है कि महाराज परीक्षित के समक्ष धर्म के प्रतिनिधि और पृथ्वी के प्रतिनिधि के कष्टों को यह साबित करने की योजना बनाई गई थी कि महाराज परीक्षित आदर्श कार्यकारी प्रमुख थे क्योंकि वे अच्छी तरह से जानते थे कि गायों (पृथ्वी) और ब्राह्मणों (धार्मिक सिद्धांतों) को कैसे सुरक्षा प्रदान की जाए। आध्यात्मिक उन्नति के दो स्तंभ। हर कोई प्रभु के पूर्ण नियंत्रण में है। वह अपने कार्य में बिल्कुल सही हैं जब वह किसी से कुछ करने की इच्छा रखते हैं, विशेष मामले पर विचार किए बिना। इस प्रकार महाराज परीक्षित को उनकी महानता के लिए परीक्षण पर रखा गया। अब देखते हैं कि कैसे वह अपने विचारशील मन से इसे हल करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥