हालांकि बैल या धर्म का व्यक्तित्व और गाय या पृथ्वी का व्यक्तित्व अच्छी तरह जानते थे कि कलियुग का व्यक्तित्व उनके दुखों का सीधा कारण है, फिर भी, भगवान के भक्तों के रूप में, वे यह भी अच्छी तरह जानते थे कि भगवान की स्वीकृति के बिना कोई भी उन्हें परेशान नहीं कर सकता। पद्म पुराण के अनुसार, हमारी वर्तमान परेशानी पापों के फलने-फूलने के कारण है, लेकिन शुद्ध भक्ति सेवा के निष्पादन से वे पाप-बीज भी धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार भक्तों द्वारा शरारती लोगों को देखे जाने पर भी वे उन्हें दिए गए कष्टों के लिए दोषी नहीं ठहराते हैं। वे यह मान लेते हैं कि शरारती व्यक्ति को किसी अप्रत्यक्ष कारण से कार्य करने के लिए बनाया जाता है, और इसलिए वे पीड़ाओं को सहन करते हैं, उन्हें छोटी-छोटी खुराक में ईश्वर-दत्त मानते हैं, अन्यथा पीड़ा अधिक होनी चाहिए थी।
महाराज परीक्षित प्रत्यक्ष शरारती व्यक्ति के विरुद्ध आरोप का बयान प्राप्त करना चाहते थे, लेकिन उन्होंने उपर्युक्त आधारों पर देने से इनकार कर दिया। हालाँकि, सट्टा दार्शनिक भगवान की स्वीकृति को नहीं पहचानते हैं; वे अपने तरीके से पीड़ाओं का कारण जानने की कोशिश करते हैं, जैसा कि निम्नलिखित छंदों में वर्णित किया जाएगा। श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार, ऐसे सट्टेबाज खुद भ्रमित होते हैं, और इस प्रकार वे यह नहीं जान सकते कि सभी कारणों का अंतिम कारण सर्वोच्च भगवान, भगवत्ता का व्यक्तित्व है।
