राज्ञो हि परमो धर्म: स्वधर्मस्थानुपालनम् ।
शासतोऽन्यान् यथाशास्त्रमनापद्युत्पथानिह ॥ १६ ॥
अनुवाद
राजा का सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है कि सामान्य समय में जब कोई आपात स्थिति न हो, तो अच्छे लोगों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करना और शास्त्रों के विधि-विधानों से भटकने वालों को सज़ा देना।
It is the supreme duty of the ruler to provide every possible protection to law-abiding persons and to punish those who, in normal times, when there is no emergency, deviate from the ordinances of the scriptures.
तात्पर्य
शास्त्रों में आपद्-धर्म का उल्लेख मिलता है। यह आपद्-धर्म अति दुखद समय में धर्म के प्रतिपालन की बात कहता है। ऐसा कहा जाता है कि महान ऋषि विश्वामित्र को एक बार विकट परिस्थितियों से निपटने के लिए कुत्ते का मांस खाना पड़ा था। आपातकाल में, सभी प्रकार के पशुओं का मांस खाया जा सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पशु खाने वालों को पालने के लिए नियमित रूप से बूचड़खाने बनने चाहिए और राज्य को इस प्रणाली को प्रोत्साहित करना चाहिए। सामान्य समय में, किसी के स्वाद के लिए भी मांस खाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। यदि कोई ऐसा करता है, तो राजा या कार्यकारी प्रमुख को उसे अत्यधिक भोग-विलास के लिए दंडित करना चाहिए। विभिन्न कर्तव्यों में लगे विभिन्न व्यक्तियों के लिए नियमित रूप से शास्त्रीय आज्ञाएँ दी गई हैं, और जो उनका पालन करता है उसे स्व-धर्म-स्थ या अपने vorgeschriebenen कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान कहा जाता है। भगवद्-गीता (18.48) में यह सलाह दी गई है कि व्यक्ति को अपने व्यावसायिक निर्धारित कर्तव्यों को नहीं छोड़ना चाहिए, भले ही वे हमेशा निर्दोष न हों। परिस्थितियों के वश में आने पर आपातकाल के मामलों में ऐसे स्व-धर्म का उल्लंघन किया जा सकता है, लेकिन सामान्य समय में उनका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। राज्य कार्यकारी प्रमुख को यह देखना है कि ऐसा स्व-धर्म अनुयायी द्वारा नहीं बदला जाता है, चाहे वह कुछ भी हो, और उसे स्व-धर्म के अनुयायी को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए। उल्लंघन करने वाले को śāstra के नियमों के अनुसार दंड के अधीन किया जाता है, और राजा का कर्तव्य यह देखना है कि हर कोई अपने व्यावसायिक कर्तव्य का सख्ती से पालन करे, जैसा कि शास्त्र में निर्धारित है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥