श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 16: परीक्षित ने कलियुग का सत्कार किस तरह किया  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  1.16.34 
यो वै ममातिभरमासुरवंशराज्ञा-
मक्षौहिणीशतमपानुददात्मतन्त्र: ।
त्वां दु:स्थमूनपदमात्मनि पौरुषेण
सम्पादयन् यदुषु रम्यमबिभ्रदङ्गम् ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
हे धर्मात्मा, मैं नास्तिक राजाओं द्वारा लगाए गए अनावश्यक सैन्य दल के बोझ तले सिसक रही थी, और तब मुझे भगवान के कृपा से मुक्ति मिली। इसी तरह, आप भी एक संकटपूर्ण स्थिति में थे, अपनी स्थिति की दृढ़ता में कमजोर हो गए थे, और इसलिए उन्होंने आपको मुक्त करने के लिए यदुवंश में अपनी आंतरिक शक्ति द्वारा अवतार लिया।
 
O man of Dharma, I was burdened with the weight of the huge army deployed by the atheist kings and now I have been able to recover from it by the grace of the Lord. Similarly, you too were in a painful condition and could not even stand. Thus, to rescue you also, He appeared in the Yadu dynasty with His internal power.
तात्पर्य
असुर ऐश्वर्यशाली जीवन जीना चाहते हैं, भले ही दूसरों की ख़ुशी की कीमत पर ही क्यों न हो। इस महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए असुर, विशेषकर नास्तिक राजा या राज्य के कार्यकारी प्रमुख, शांतिपूर्ण समाज में युद्ध लाने के लिए हर तरह के खतरनाक हथियार से खुद को लैस करने की कोशिश करते हैं। उनकी व्यक्तिगत उन्नति के अलावा कोई और महत्वाकांक्षा नहीं होती, और इसलिए धरती माँ सैन्य शक्ति की इतनी अनुचित वृद्धि से बोझिल महसूस करती है। असुर कुल की वृद्धि से, जो धर्म के सिद्धांतों का पालन करते हैं, वे दुखी हो जाते हैं, खासकर भक्त या देवता।

ऐसी स्थिति में, भगवान अपने अवतार लेते हैं ताकि अनचाहे असुरों को जीत लिया जाए और धर्म के सच्चे सिद्धांतों को फिर से स्थापित किया जाए। यह भगवान श्री कृष्ण का मिशन था, और उन्होंने इसे पूरा किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)