श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 16: परीक्षित ने कलियुग का सत्कार किस तरह किया  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.16.25 
धरण्युवाच
भवान् हि वेद तत्सर्वं
यन्मां धर्मानुपृच्छसि ।
चतुर्भिर्वर्तसे येन
पादैर्लोकसुखावहै: ॥ २५॥
 
 
अनुवाद
(गाय के रूप में) इस पृथ्वी देवी ने (बैल के रूप में) धर्म के साक्षात स्वरूप पुरुष को इस प्रकार उत्तर दिया : हे धर्म, जो कुछ भी आपने मुझसे पूछा है, वह आपको ज्ञात हो जाएगा। मैं आपके उन सभी प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करूँगी। एक समय आप भी अपने चार पाँवों से स्वयं का पालन करते थे और आपने भगवान की कृपा से सम्पूर्ण विश्व में सुख को वृद्धि प्रदान की थी।
 
The Earth Goddess (in the form of a cow) replied to the man in the form of Dharma (in the form of a bull) thus: O Dharma, whatever you have asked me, you will come to know it. I will try to answer all your questions. Once you too were brought up by your four feet and by the grace of God you increased happiness in the whole world.
तात्पर्य
धर्म के सिद्धांत स्वयं भगवान द्वारा स्थापित किए गए हैं, और ऐसे कानूनों के निष्पादक धर्मराज, या यमराज हैं। ऐसे सिद्धांत सतयुग में पूर्ण रूप से कार्य करते हैं; त्रेता-युग में वे एक चौथाई भाग से कम हो जाते हैं; द्वापर-युग में वे आधे हो जाते हैं, और कलियुग में वे एक चौथाई से भी कम हो जाते हैं, जो धीरे-धीरे शून्य बिंदु तक घटते जाते हैं, और फिर विनाश होता है। दुनिया में खुशी व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से धार्मिक सिद्धांतों के पालन पर आनुपातिक रूप से निर्भर करती है। वीरता का सबसे अच्छा हिस्सा सभी प्रकार की बाधाओं के बावजूद सिद्धांतों को बनाए रखना है। इस प्रकार व्यक्ति जीवन काल में खुश रह सकता है और अंततः भगवान के पास वापस लौट सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)