निर्माता ब्रह्मा द्वारा जीवों की रचना की जाती है और निर्मित जीवों को निरंतर ईश्वर की ओर वापस लाने के लिए बलिदान करने की प्रणाली भी उनके द्वारा ही निर्मित की गई है। प्रणाली यह है कि जीव अनाज और सब्जियों पर निर्भर होते हैं, और ऐसा भोजन खाने से उन्हें रक्त और वीर्य के रूप में शरीर की महत्वपूर्ण शक्ति मिलती है, और रक्त और वीर्य से ही एक जीव दूसरे जीवों को बनाने में सक्षम होता है। लेकिन अनाज, घास आदि का उत्पादन बारिश द्वारा संभव होता है, और यह बारिश अनुशंसित बलिदानों के प्रदर्शन से उचित रूप से होती है। इस तरह के बलिदान वेदों के कार्यों द्वारा निर्देशित होते हैं, जैसे कि साम, यजुर, ऋग और अथर्व। मनु-स्मृति में अनुशंसा की गई है कि अग्नि की वेदी पर बलिदान चढ़ाने से सूर्य देवता प्रसन्न होते हैं। जब सूर्य देवता प्रसन्न होते हैं, तो वे समुद्र से पानी एकत्र करते हैं, और इस प्रकार क्षितिज पर पर्याप्त बादल इकट्ठा होते हैं और बारिश होती है। पर्याप्त बारिश के बाद, मनुष्यों और सभी जानवरों के लिए पर्याप्त अनाज का उत्पादन होता है, और इस प्रकार जीवों में प्रगतिशील गतिविधि के लिए ऊर्जा होती है। हालाँकि, म्लेच्छ बैल और गायों के साथ-साथ अन्य जानवरों को मारने के लिए बूचड़खाने बनाने की योजना बनाते हैं, यह सोचकर कि वे कारखानों की संख्या बढ़ाकर और अनाज के उत्पादन और बलिदान के प्रदर्शन की परवाह किए बिना मांसाहारी भोजन पर रहकर समृद्ध होंगे। लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि जानवरों के लिए भी उन्हें घास और सब्जियां पैदा करनी होंगी, अन्यथा जानवर जीवित नहीं रह सकते। और जानवरों के लिए घास का उत्पादन करने के लिए उन्हें पर्याप्त वर्षा की आवश्यकता होती है। इसलिए उन्हें अंततः सूर्य-देव, इंद्र और चंद्र जैसे देवताओं की दया पर निर्भर रहना होगा, और ऐसे देवताओं को बलिदान के प्रदर्शन से संतुष्ट किया जाना चाहिए। जैसा कि हमने कई बार उल्लेख किया है, यह भौतिक जगत एक प्रकार का कारागृह है। देवता प्रभु के सेवक हैं जो कारागृह के उचित रखरखाव को देखते हैं। ये देवता यह देखना चाहते हैं कि विद्रोही जीव, जो विश्वासपूर्वक जीवित रहना चाहते हैं, धीरे-धीरे भगवान की सर्वोच्च शक्ति की ओर मुड़ रहे हैं। इसलिए, शास्त्रों में बलिदान करने की प्रणाली की अनुशंसा की जाती है। भौतिकवादी पुरुष कड़ी मेहनत करना चाहते हैं और कामुक आनंद के लिए फलदायी परिणामों का आनंद लेते हैं। इस प्रकार वे जीवन के हर कदम पर कई प्रकार के पाप कर रहे हैं। हालाँकि, जो लोग भगवान की भक्ति सेवा में सचेत रूप से लगे हुए हैं, वे सभी प्रकार के पापों और पुण्यों के पार हैं। उनकी गतिविधियाँ भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के संदूषण से मुक्त हैं। भक्तों के लिए निर्धारित बलिदानों के प्रदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि भक्त का जीवन ही बलिदान का प्रतीक है। लेकिन जो लोग कामुक आनंद के लिए फलदायी गतिविधियों में लिप्त हैं, उन्हें निर्धारित बलिदान करना चाहिए क्योंकि फलदायी कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए सभी पापों की प्रतिक्रिया से मुक्त होने का यही एकमात्र उपाय है। बलिदान ऐसे संचित पापों का प्रतिकार करने का साधन है। देवता प्रसन्न होते हैं जब इस तरह के बलिदान किए जाते हैं, जैसे जेल अधिकारी संतुष्ट होते हैं जब कैदी आज्ञाकारी विषयों में बदल जाते हैं। हालाँकि, भगवान चैतन्य ने केवल एक यज्ञ, या बलिदान की सिफारिश की है, जिसे संकीर्तन-यज्ञ कहा जाता है, हरि कृष्ण का नाम संकीर्तन, जिसमें हर कोई भाग ले सकता है। इस प्रकार भक्त और फलदायी दोनों कार्यकर्ता संकीर्तन-यज्ञ के प्रदर्शन से समान लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
