धर्म उवाच
कच्चिद्भद्रेऽनामयमात्मनस्ते
विच्छायासि म्लायतेषन्मुखेन ।
आलक्षये भवतीमन्तराधिं
दूरे बन्धुं शोचसि कञ्चनाम्ब ॥ १९ ॥
अनुवाद
धर्म रूपी साँड़ ने पूछा : देवी, आप स्वयं स्वस्थ और प्रसन्न तो हैं? आप शोक की छाया से घिरी क्यों हैं? आपके चेहरे से ऐसा लगता है कि आप मुरझा गई हैं। क्या आपको कोई भीतरी रोग हो गया है या आप किसी दूर रहने वाले अपने संबंधी के बारे में सोच रही हैं?
Dharma (in the form of a bull) asked: O Madam, are you yourself healthy and happy? Why are you covered with the shadow of grief? Your face looks as if you have become pale. Have you got some internal disease or are you thinking about some distant relative of yours?
तात्पर्य
इस कलयुग में दुनिया भर के लोग हमेशा चिंताओं से भरे रहते हैं। हर कोई किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त है। इस युग के लोगों के चेहरों से ही उनके मन की स्थिति का पता लगाया जा सकता है। हर कोई अपने प्रियजन की अनुपस्थिति को महसूस करता है जो घर से दूर है। कलयुग का विशेष लक्षण यह है कि आज किसी भी परिवार को एक साथ रहने का सौभाग्य नहीं मिल पाता है। आजीविका कमाने के लिए या तो पिता पुत्र से दूर रहता है या पत्नी पति से दूर रहती है इत्यादि। भीतरी रोग, अपनों से बिछड़ना, और अपनी स्थिति को बनाए रखने की चिंताएँ ये कुछ महत्वपूर्ण ऐसे पहलू हैं जो इस युग के लोगों को हमेशा दुखी रखते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥