कृष्ण और उनके शुद्ध भक्त अलग नहीं किए जा सकते हैं, इसलिए भक्त की स्तुति करना प्रभु की स्तुति करने के समान है और इसके विपरीत भी। महाराज परीक्षित अपने पूर्वजों जैसे महाराज युधिष्ठिर और अर्जुन की महिमा सुनकर प्रसन्न नहीं होते अगर वे भगवान कृष्ण के कार्यों से जुड़े नहीं होते। प्रभु विशेष रूप से अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए अवतरित होते हैं (परित्राणाय साधूनाम)। प्रभु की उपस्थिति भक्तों के लिए सबसे गौरवशाली होती है क्योंकि प्रभु और उनकी विभिन्न शक्तियों की उपस्थिति के बिना वे एक पल भी नहीं रह सकते। प्रभु भक्तों के कार्यों और महिमा के लिए उपस्थित रहते हैं और इसलिए महाराज परीक्षित को प्रभु की उपस्थिति तब महसूस हुई जब उनकी महिमा उनके कार्यों के लिए की गई, विशेषकर जब उनकी माँ के गर्भ में प्रभु द्वारा उनकी रक्षा की गई। प्रभु के भक्त कभी खतरे में नहीं होते, लेकिन भौतिक दुनिया में जो हर कदम पर खतरों से भरी है, भक्त स्पष्ट रूप से खतरनाक स्थितियों में रखे जाते हैं, और जब प्रभु द्वारा उनकी रक्षा की जाती है, तो प्रभु का गुणगान किया जाता है। प्रभु कृष्ण को भगवद्गीता के वक्ता के रूप में इतनी महिमा इसलिए नहीं मिलती अगर उनके भक्त जैसे पाण्डव कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में उलझे नहीं रहते। प्रभु के ऐसे सभी कार्यों का उल्लेख स्वागत सम्मान में किया गया और महाराज परीक्षित पूरे संतुष्टि के साथ उन लोगों को पुरस्कृत करते थे जो ऐसे स्वागत सम्मान प्रस्तुत करते थे। आज और उन दिनों स्वागत सम्मान प्रस्तुत करने में अंतर यह है कि पहले स्वागत सम्मान महाराज परीक्षित जैसे व्यक्ति को दिए जाते थे। स्वागत सम्मान तथ्यों और आंकड़ों से भरे होते थे और जो लोग ऐसे स्वागत सम्मान प्रस्तुत करते थे उन्हें भरपूर पुरस्कृत किया जाता था, जबकि वर्तमान दिनों में स्वागत सम्मान हमेशा तथ्यात्मक बयानों के साथ नहीं बल्कि पद धारक को खुश करने के लिए प्रस्तुत किए जाते हैं और अक्सर ये चापलूसी और झूठ से भरे होते हैं। और शायद ही कभी ऐसे स्वागत सम्मान प्रस्तुत करने वालों को गरीब रिसीवर द्वारा पुरस्कृत किया जाता है।
