श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 16: परीक्षित ने कलियुग का सत्कार किस तरह किया  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.16.10 
सूत उवाच
यदा परीक्षित् कुरुजाङ्गलेऽवसत्
कलिं प्रविष्टं निजचक्रवर्तिते ।
निशम्य वार्तामनतिप्रियां तत:
शरासनं संयुगशौण्डिराददे ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
सूत गोस्वामी ने कहा: जब महाराज परीक्षित कुरु साम्राज्य की राजधानी में विराजमान थे, तभी उन्होंने अपने राज्य की सीमा के भीतर कलियुग के लक्षण प्रवेश करते हुए देखा। जब उन्हें इसकी जानकारी मिली, तो उन्हें यह बिल्कुल भी पसंद नहीं आया। लेकिन इससे उन्हें कलियुग के विरुद्ध लड़ने का अवसर ज़रूर मिल गया। अतः उन्होंने अपना धनुष-बाण उठाया और युद्ध की तैयारी की।
 
Suta Goswami said: When Maharaja Pariksit was living in the capital of the Kuru kingdom, he saw the signs of Kali-yuga entering within the boundaries of his kingdom. When he learned of this, he did not like it. But it did give him an opportunity to fight against it. Therefore he took up his bow and arrow and prepared for military action.
तात्पर्य
महाराज परीक्षित का शासन काफ़ी सफ़लतापूर्ण था जिसके चलते वो राजधानी में चैन से रहा करते थे। मगर उन्हें सूचना मिली कि कलियुग के लक्षण उनके राज्य में घुस चुके है, उन्हें ये सुनकर कुछ ख़ुशी नहीं हुई। कलियुग के लक्षण कौन से हैं? वे हैं (१) औरतों के साथ अवैध संबंध, (२) मांसाहार, (३) शराब और (४) जुआ। कलियुग का मतलब होता है कलह का ज़माना और ऊपर बताए हुए चारों लक्षण ही समाज में कलह की जड़ हैं। महाराज परीक्षित को पता चला कि राज्य के कुछ लोग ये काम पहले ही कर चुके हैं, और वो इस अशांति की वजहों के ख़िलाफ़ तुरंत कदम उठाना चाहते थे। इसका मतलब है कि महाराज परीक्षित के शासनकाल तक भी समाज में ऐसे कामों का ज़िक्र नहीं था, और जैसे ही इसकी ख़बर मिली, वो इन्हें जड़ से ख़त्म करना चाहते थे। ये ख़बर उनके पचाने लायक़ नहीं थी, पर एक तरह से ये अच्छी भी थी, क्योंकि महाराज परीक्षित को लड़ने का मौका मिला। छोटे-छोटे राज्यों से लड़ने की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि सब शांत तरीके से उनके अधीन थे, मगर कलयुग के पापियों ने उन्हें युद्ध दिखाने का मौका दे दिया। एक सच्चा क्षत्रिय राजा लड़ने का मौका मिलने पर हमेशा खुश रहता है, वैसे ही जैसे किसी खेल को खेलने की चाहत रखने वालों को मौका मिलने पर खुशी होती है। ये कहना ग़लत है कि कलियुग में ऐसे लक्षण होने तय हैं। अगर ऐसा है तो फिर ऐसे लक्षणों का मुक़ाबला करने की तैयारी क्यों की जाती थी? इस तरह की बहसें आलसी और बदकिस्मत लोग ही करते हैं। बरसात के मौसम में बारिश तो होनी ही है, फिर भी लोग खुद को बचाने की तैयारी करते हैं। ठीक वैसे ही, कलियुग में ऊपर बताए हुए लक्षण समाज में फैल ही जाएँगे, पर राज्य की ज़िम्मेदारी है कि वह निवासियों को कलियुग के एजेंटों से दूर रखे। महाराज परीक्षित कलियुग के लक्षणों में लिप्त पापियों को सज़ा देना चाहते थे, और धर्म की संस्कृति के ज़रिए उन निवासियों को बचाना चाहते थे जिनकी आदतें सही थीं। राजा का फ़र्ज़ होता है इस तरह की रक्षा करना, और जब महाराज परीक्षित लड़ने की तैयारी कर रहे थे, तब वो बिलकुल सही कर रहे थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)