भक्तिभाव से निरंतर स्मरण करने से उत्पन्न भक्तिमय शुद्ध चेतना के द्वारा पाण्डवों ने आदि नारायण भगवान श्रीकृष्ण के अधिशासन वाले वैकुण्ठलोक को प्राप्त कर लिया। वैकुण्ठलोक उन्हें ही प्राप्त होता है जो बिना विचलित हुए एक परमेश्वर का ध्यान लगाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के इस धाम को गोलोक वृंदावन कहते हैं और यह उन व्यक्तियों को प्राप्त नहीं होता जो जीवन की भौतिक अवधारणा में लीन रहते हैं। परंतु समस्त भौतिक कल्मष से पूर्णतः शुद्ध होने के कारण पाण्डवों ने इसी शरीर में उस धाम को प्राप्त कर लिया।
Thus, by the devotional pure consciousness generated by constant remembrance with devotion, they attained Vaikunthaloka ruled by Adi Narayana Lord Krishna. This Vaikunthaloka is attained only by those who meditate on the one Supreme Lord with unwavering devotion. This abode of Lord Sri Krishna is called Goloka Vrindavana and it is not attained by those who are absorbed in the material concept of life. But being completely purified from all material contamination, the Pandavas attained that abode in their very bodies.
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार, भौतिक गुणों के तीनों प्रकारों, अर्थात् सत्व, रजस और तमस से मुक्त और पराविद्या में स्थित व्यक्ति शरीर के बिना बदले हुए जीवन की उच्चतम पूर्णता प्राप्त कर सकता है। श्रील सनातन गोस्वामी अपने हरि-भक्ति-विलास में कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कोई भी हो, एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में आध्यात्मिक अनुशासनात्मक कार्यों को करके एक दो बार जन्म लेने वाले ब्राह्मण की परिपूर्णता प्राप्त कर सकता है, बिल्कुल एक कीमियागर रासायनिक हेरफेर द्वारा गन धातु को सोने में बदल सकता है। इसलिए ब्राह्मण बनने की प्रक्रिया में वास्तविक मार्गदर्शन ही मायने रखता है, भले ही शरीर बदले या बिना शरीर बदले भगवान के पास वापस जाएँ। श्रील जीव गोस्वामी टिप्पणी करते हैं कि इस संबंध में प्रयुक्त शब्द 'हि' सकारात्मक रूप से इस सत्य की पुष्टि करता है और इस तथ्यात्मक स्थिति में कोई संदेह नहीं है। भगवत-गीता (14.26) भी श्रील जीव गोस्वामी के इस कथन की पुष्टि करते हुए कहती है कि जो कोई भी बिना विचलित हुए भक्ति सेवा को व्यवस्थित रूप से करता है, वह भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के दूषित होने को पार करते हुए ब्रह्म की परिपूर्णता प्राप्त कर सकता है और जब स्वयं उसी भक्ति सेवा के निष्पादन से ब्रह्म की परिपूर्णता और भी अधिक उन्नत हो जाती है, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि शरीर के बिना बदले हुए कोई भी व्यक्ति सर्वोच्च आध्यात्मिक ग्रह, गोलोक वृंदावन को प्राप्त कर सकता है, जैसा कि हमने पहले ही प्रभु के अपने निवास पर बिना शरीर बदले हुए लौटने के संबंध में चर्चा की है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥