श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.15.45 
सर्वे तमनुनिर्जग्मुर्भ्रातर: कृतनिश्चया: ।
कलिनाधर्ममित्रेण द‍ृष्ट्वा स्पृष्टा: प्रजा भुवि ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
महाराज युधिष्ठिर के छोटे भाइयों ने देखा कि कलयुग संपूर्ण विश्व में व्याप्त हो चुका है और राज्य के नागरिक पहले से ही पापकर्म से ग्रस्त हैं। इसलिए उन्होंने अपने बड़े भाई के पदचिन्हों पर चलने का फैसला किया।
 
The younger brothers of Maharaja Yudhisthira saw that Kali-yuga had already set in over the world and the citizens of the kingdom were already affected by adharma. Therefore, they decided to follow in the footsteps of their elder brother.
तात्पर्य
महाराज युधिष्ठिर के छोटे भाई पहले से ही महान सम्राट के आज्ञाकारी अनुयायी थे और उन्हें जीवन के परम लक्ष्य को जानने के लिए पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित किया गया था। इसलिए उन्होंने निश्चित रूप से अपने सबसे बड़े भाई का अनुसरण करते हुए भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति सेवा की। सनातन-धर्म के सिद्धांतों के अनुसार, व्यक्ति को जीवन के आधे समय समाप्त होने के बाद पारिवारिक जीवन से संन्यास ले लेना चाहिए और आत्म-साक्षात्कार में संलग्न होना चाहिए। लेकिन खुद को संलग्न करने का प्रश्न हमेशा तय नहीं होता है। कभी-कभी सेवानिवृत्त पुरुष भ्रमित हो जाते हैं कि जीवन के अंतिम दिनों में खुद को कैसे संलग्न करें। यहाँ पाण्डवों जैसे अधिकारियों का एक निर्णय है। उन सभी ने भगवान श्रीकृष्ण, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की भक्ति सेवा को अनुकूल रूप से विकसित करने में खुद को व्यस्त कर लिया। स्वामी श्रीधर के अनुसार, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, या विभिन्न व्यक्तियों द्वारा कल्पित फलदायी गतिविधियाँ, दार्शनिक अटकलें और मोक्ष, जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं हैं। वे कमोबेश उन व्यक्तियों द्वारा अभ्यास किए जाते हैं जिन्हें जीवन के परम लक्ष्य की कोई जानकारी नहीं है। जीवन का अंतिम लक्ष्य पहले से ही भगवान ने स्वयं भगवद-गीता (18.64) में बताया है और पाण्डव इसे बिना किसी हिचकिचाहट के अनुसरण करने के लिए काफी बुद्धिमान थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)