तब उन्होंने उत्तर दिशा की ओर अपने पूर्वजों और महापुरुषों द्वारा स्वीकृत मार्ग पर चलते हुए प्रस्थान किया, जिससे वे ईश्वर के विचार में पूर्ण रूप से लीन हो सकें। जहाँ भी वे गए, वैसे ही रहे।
Then he set out northwards, following the path accepted by his ancestors and great men, so that he could fully immerse himself in the thought of God. He lived in this manner wherever he went.
तात्पर्य
यह इस श्लोक से समझा जाता है कि महाराज युधिष्ठिर अपने पूर्वजों और भगवान के महान भक्तों के मार्ग का अनुसरण करते थे। जैसाकि हमने कई बार पहले चर्चा की है कि वर्णाश्रम-धर्म की व्यवस्था, जैसा कि दुनिया के निवासियों द्वारा, खासकर आर्यवर्त प्रांत के निवासियों द्वारा कड़ाई से पालन किया जाता था, एक निश्चित जीवन अवस्था में सभी पारिवारिक संबंधों को छोड़ने के महत्व पर जोर देता है। प्रशिक्षण और शिक्षा इसी तरह से दी जाती थी और इस प्रकार महाराज युधिष्ठिर की तरह एक सम्मानित व्यक्ति को आत्म-अहसास और भगवान के पास वापस जाने के लिए सभी पारिवारिक संबंधों को छोड़ना पड़ता था। कोई भी राजा या सम्मानित सज्जन जीवन के अंत तक पारिवारिक जीवन जारी नहीं रखता क्योंकि उसे आत्मघाती और मानव जीवन की पूर्णता के हित के विरुद्ध माना जाता था। सभी पारिवारिक बाधाओं से मुक्त होने और भगवान कृष्ण की भक्ति सेवा में अपने आप को शत-प्रतिशत समर्पित करने के लिए, इस प्रणाली की सभी के लिए हमेशा सिफारिश की जाती है क्योंकि यह अधिकार का मार्ग है। भगवान ने भगवद-गीता (18.62) में निर्देश दिया है कि व्यक्ति को अपने जीवन के अंतिम चरण में कम से कम भगवान का भक्त बनना चाहिए। महाराज युधिष्ठिर की तरह भगवान की एक निष्ठावान आत्मा को अपनी रुचि के लिए भगवान के इस निर्देश का पालन करना चाहिए। विशिष्ट शब्द ब्रह्म परम भगवान श्री कृष्ण को इंगित करते हैं। भगवद-गीता (10.13) में अर्जुन द्वारा असित, देवल, नारद और व्यास जैसे महान अधिकारियों के संदर्भ में इसकी पुष्टि की गई है। इस प्रकार महाराज युधिष्ठिर, उत्तर के लिए घर छोड़ते समय, लगातार अपने पूर्वजों के साथ-साथ सभी समय के महान भक्तों के मार्ग का अनुसरण करते हुए, अपने भीतर ही भगवान श्री कृष्ण को याद रखते थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥