श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.15.43 
चीरवासा निराहारो बद्धवाङ्‍मुक्तमूर्धज: ।
दर्शयन्नात्मनो रूपं जडोन्मत्तपिशाचवत् ।
अनवेक्षमाणो निरगादश‍ृण्वन्बधिरो यथा ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद, महाराज युधिष्ठिर ने फटे-पुराने कपड़े पहन लिए, उन्होंने ठोस खाना खाना छोड़ दिया, जानबूझकर गूंगे बन गए और अपने बालों को खुला छोड़ दिया। इन सबके मिल-जुलकर, वे किसी लावारिस या काम-धंधे वाले पागल की तरह दिखने लगे। उन्होंने किसी भी चीज़ के लिए अपने भाइयों पर निर्भरता छोड़ दी। वे बहरे इंसान की तरह कुछ भी नहीं सुनते थे।
 
Thereafter Maharaja Yudhishthira wore torn clothes, stopped taking solid food, deliberately became mute and let his hair loose. All this combined made him look like a madman or a lunatic without any profession. He could not depend on his brothers for anything. He could not hear anything like a deaf man.
तात्पर्य
इस प्रकार सभी बाहरी मामलों से मुक्त होकर, उन्हें शाही जीवन या पारिवारिक प्रतिष्ठा से कोई लेना-देना नहीं था, और सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए उन्होंने खुद को बिल्कुल एक जड़ पागल बच्चे की तरह प्रस्तुत किया और भौतिक मामलों के बारे में बात नहीं की। भाइयों पर उनकी कोई निर्भरता नहीं थी, जो हर समय उनकी मदद करते रहे थे। हर चीज से पूर्ण स्वतंत्रता के इस चरण को निर्भीकता का शुद्ध चरण भी कहा जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)