त्रित्वे हुत्वा च पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनि: ।
सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥ ४२ ॥
अनुवाद
इस प्रकार, पंचभौतिक स्थूल शरीर को भौतिक प्रकृति के तीन गुणों में विलीन करके, उन्होंने उन्हें एक अज्ञानता में मिला दिया और फिर उस अज्ञानता को आत्म या ब्रह्म में विलीन कर दिया, जो सभी परिस्थितियों में अक्षय है।
Thus, having destroyed the gross body composed of the five elements, He merged it with the three modes of nature and mixed it with ignorance, and then He merged that ignorance into the Self or Brahman, which is ever-indestructible.
तात्पर्य
वह सब जो भौतिक संसार में प्रकट होता है, वह महात-तत्त्व-अव्यक्त का उत्पाद है, और चीजें जो हमारे भौतिक दृष्टि में दिखाई देती हैं, वह उन तरह-तरह के भौतिक उत्पादों के संयोजन और क्रमपरिवर्तन के अलावा और कुछ नहीं हैं। लेकिन जीवित इकाई ऐसे भौतिक उत्पादों से अलग है। यह जीवित इकाई के भगवान के शाश्वत सेवक रूप में अपनी शाश्वत प्रकृति को भूल जाने के कारण है, और भौतिक प्रकृति के तथाकथित स्वामी होने की उसकी झूठी अवधारणा, कि वह उसे झूठे भाव के आनंद के अस्तित्व में प्रवेश करने के लिए बाध्य पाता है। इस प्रकार भौतिक ऊर्जाओं की सहवर्ती पीढ़ी मन के भौतिक रूप से प्रभावित होने का मुख्य कारण है। इस प्रकार पाँच तत्वों का स्थूल शरीर उत्पन्न होता है। महाराज युधिष्ठिर ने क्रिया को उलट दिया और शरीर के पाँच तत्वों को भौतिक प्रकृति के तीन प्रकारों में विलीन कर दिया। शरीर का गुणात्मक भेद अच्छा, बुरा या मध्यस्थ होने के कारण समाप्त हो जाता है, और फिर से गुणात्मक अभिव्यक्ति भौतिक ऊर्जा में विलीन हो जाती है, जो शुद्ध जीवित प्राणी की झूठी भावना से उत्पन्न होती है। जब कोई इस प्रकार सर्वोच्च भगवान, आध्यात्मिक आकाश के असंख्य ग्रहों में से एक में, विशेष रूप से गोलोक वृंदावन में, परमेश्वर के सहयोगी बनने के लिए इच्छुक होता है, तो उसे हमेशा यह सोचना होगा कि वह भौतिक ऊर्जा से अलग है; उसका इससे कोई लेना-देना नहीं है, और उसे शुद्ध आत्मा, ब्राह्मण के रूप में खुद को साकार करना है, जो सर्वोच्च ब्रह्म (परमेश्वर) के साथ गुणात्मक रूप से समान है। महाराज युधिष्ठिर ने परीक्षित और वज्र को अपना राज्य बांटने के बाद, खुद को दुनिया का सम्राट या कुरु वंश का मुखिया नहीं माना। भौतिक संबंधों से मुक्ति की भावना, साथ ही स्थूल और सूक्ष्म घेरे से भौतिक व्यवधान से मुक्ति, भौतिक दुनिया में होने के बावजूद, किसी को भी भगवान के सेवक के रूप में कार्य करने के लिए स्वतंत्र बनाती है। इस अवस्था को जीवन्मुक्त अवस्था या भौतिक दुनिया में भी मुक्त अवस्था कहा जाता है। यही भौतिक अस्तित्व को समाप्त करने की प्रक्रिया है। किसी को न केवल यह सोचना चाहिए कि वह ब्राह्मण है, बल्कि ब्राह्मण की तरह कार्य करना चाहिए। जो केवल खुद को ब्राह्मण समझता है वह एक अवैयक्तिकतावादी है। और जो ब्राह्मण की तरह कार्य करता है वह शुद्ध भक्त है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥