श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.15.27 
देशकालार्थयुक्तानि हृत्तापोपशमानि च ।
हरन्ति स्मरतश्चित्तं गोविन्दाभिहितानि मे ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
अब मैं भगवान (गोविन्द) द्वारा मुझे दिए गए उपदेशों के प्रति आकर्षित हूँ क्योंकि वे सभी परिस्थितियों में हृदय की जलन को शांत करने वाले आदेशों से भरे हुए हैं।
 
Now I am attracted to the teachings given to me by the Lord (Govind), because they are full of instructions that can calm the burning of the heart in all circumstances of time and place.
तात्पर्य
यहाँ अर्जुन भगवद्-गीता के उपदेश का उल्लेख करता है, जिसे भगवान ने उसे कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में दिया था। भगवान भगवद्-गीता के उपदेश को केवल अकेले अर्जुन के लाभ के लिए ही नहीं, बल्कि सभी समय और सभी देशों के लिए भी पीछे छोड़ गये। भगवद्-गीता, जिसे भगवान के परम व्यक्तित्व ने बोला है, सभी वैदिक ज्ञान का सार है। यह बहुत कम समय में वैदिक साहित्यों, जैसे उपनिषदों, पुराणों और वेदान्त-सूत्रों को पढ़ने वालों के लिए भगवान ने स्वयं ही सुंदरता से प्रस्तुत किया है। इसे महाभारत नामक महान ऐतिहासिक महाकाव्य में रखा गया है, जो विशेष रूप से कम बुद्धिमान वर्ग, जैसे महिलाओं, श्रमिकों और ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के उच्च वर्गों के बेकार वंशजों के लिए तैयार किया गया था। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान पर अर्जुन के हृदय में जो समस्याएँ उत्पन्न हुई थीं, उन्हें भगवद्-गीता की शिक्षाओं ने हल कर दिया था। फिर, सांसारिक लोगों की दृष्टि से भगवान के जाने के बाद, जब अर्जुन को अपनी अर्जित शक्ति और प्रसिद्धि में पराजित होने का सामना करना पड़ा, तो वह केवल सभी संबंधितों को यह सिखाने के लिए फिर से भगवद्-गीता की महान शिक्षाओं को याद करना चाहता था कि भगवद्-गीता का परामर्श सभी गंभीर समयों में किया जा सकता है, न केवल सभी प्रकार की मानसिक पीड़ाओं से राहत के लिए, बल्कि महान उलझनों से निकलने के लिए भी जो किसी को किसी गंभीर समय में परेशान कर सकती हैं।

दयालु भगवान ने भगवद्-गीता की महान शिक्षाओं को पीछे छोड़ दिया ताकि कोई भगवान के निर्देशों को तब भी ले सके जब वह भौतिक दृष्टि से दिखाई न दें। भौतिक इंद्रियों से परम भगवान का कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन अपनी अथाह शक्ति से भगवान पदार्थ की एजेंसी के माध्यम से सशर्त आत्माओं की संवेदना के लिए खुद को अवतार ले सकते हैं, जो भगवान की प्रकट ऊर्जा का एक और रूप भी है। इस प्रकार भगवद्-गीता, या भगवान के किसी भी प्रामाणिक शास्त्रीय ध्वनि प्रतिनिधित्व को भी भगवान का अवतार माना जाता है। भगवान के ध्वनि प्रतिनिधित्व और भगवान स्वयं में कोई अंतर नहीं है। कोई भी भगवान की साक्षात उपस्थिति में अर्जुन द्वारा प्राप्त किए गये उसी लाभ को भगवद्-गीता से प्राप्त कर सकता है।

भौतिक अस्तित्व के चंगुल से मुक्त होने के इच्छुक विश्वासी मानव भगवद-गीता का बहुत आसानी से लाभ उठा सकते हैं, और इस दृष्टि से, प्रभु ने अर्जुन को निर्देश दिया जैसे कि अर्जुन को इसकी आवश्यकता हो। भगवद-गीता में, ज्ञान के पाँच महत्वपूर्ण कारक बताए गए हैं (1) सर्वोच्च प्रभु, (2) जीव, (3) प्रकृति, (4) समय और स्थान और (5) गतिविधि की प्रक्रिया। इनमें से, सर्वोच्च प्रभु और जीव गुणात्मक रूप से एक हैं। दोनों के बीच के अंतर का विश्लेषण संपूर्ण और भाग के बीच के अंतर के रूप में किया गया है। प्रकृति तीन अलग-अलग प्रकारों की बातचीत प्रदर्शित करने वाला निष्क्रिय पदार्थ है, और अनंत समय और असीमित स्थान को भौतिक प्रकृति के अस्तित्व से परे माना जाता है। जीव की गतिविधियाँ विभिन्न प्रकार की योग्यताएँ हैं जो जीव को भौतिक प्रकृति के भीतर और बाहर फँसा या मुक्त कर सकती हैं। इन सभी विषयों पर भगवद-गीता में संक्षेप में चर्चा की गई है, और बाद में इन विषयों का विस्तार से श्रीमद्- भागवत में किया गया है। पाँच विषयों में से सर्वोच्च प्रभु, जीव, प्रकृति, और समय और स्थान शाश्वत हैं, लेकिन जीव, प्रकृति और समय सर्वोच्च प्रभु के निर्देशन में हैं, जो पूर्ण और किसी अन्य नियंत्रण से पूरी तरह स्वतंत्र हैं। सर्वोच्च प्रभु सर्वोच्च नियंत्रक हैं। जीव की भौतिक गतिविधि अनादि है, लेकिन इसे आध्यात्मिक गुणवत्ता में स्थानांतरित करके ठीक किया जा सकता है। इस प्रकार यह अपनी भौतिक गुणात्मक प्रतिक्रियाओं को समाप्त कर सकता है। दोनों प्रभु और जीव संज्ञानात्मक हैं, और दोनों में एक जीवित शक्ति के रूप में चेतन होने की पहचान की भावना है। लेकिन महात-तत्व नामक भौतिक प्रकृति की स्थिति के तहत जीव खुद को गलत तरीके से प्रभु से अलग समझता है। वैदिक ज्ञान की पूरी योजना का लक्ष्य इस तरह की गलत धारणा को उखाड़ फेंकना और इस तरह जीव को भौतिक पहचान के भ्रम से मुक्त करना है। जब ज्ञान और त्याग द्वारा ऐसा भ्रम मिट जाता है, तो जीव जिम्मेदार अभिनेता और उपभोक्ता भी होते हैं। प्रभु में आनंद की भावना वास्तविक है, लेकिन जीव में ऐसी भावना केवल एक तरह की इच्छाधारी इच्छा होती है। चेतना में यह अंतर दो पहचानों का अंतर है, अर्थात प्रभु और जीव। अन्यथा प्रभु और जीव में कोई अंतर नहीं है। इसलिए जीव शाश्वत रूप से एक और अलग-अलग है। भगवद-गीता का पूरा निर्देश इस सिद्धांत पर टिका है।

भगवद्-गीता में भगवान और जीव दोनों को ही सनातन यानी अनादि कहा गया है और भगवान का निवास, जो भौतिक आकाश से भी बहुत दूर है, उसे भी सनातन कहा गया है। जीव को भगवान के सनातन अस्तित्व में रहने के लिए आमंत्रित किया गया है, और जिस प्रक्रिया में जीव को भगवान के निवास तक पहुँचने में सहायता मिल सकती है, जहाँ आत्मा की मुक्त क्रिया प्रदर्शित होती है, उसे सनातन-धर्म कहते हैं। हालाँकि, भौतिक पहचान की गलत अवधारणा से मुक्त हुए बिना भगवान के शाश्वत निवास तक नहीं पहुँचा जा सकता है, और भगवद्-गीता हमें यह बताती है कि उस पूर्णता के चरण को कैसे प्राप्त किया जाए। भौतिक पहचान की गलत धारणा से मुक्त होने की प्रक्रिया को, विभिन्न चरणों में, कामनायुक्त गतिविधि, अनुभववादी दर्शन और भक्ति-भावना, यहाँ तक कि अनुवांशिक साक्षात्कार भी कहा जाता है। इस प्रकार का अनुवांशिक साक्षात्कार भगवान के साथ उपर्युक्त सभी वस्तुओं का समायोजन करके संभव होता है। वेदों में बताए अनुसार मानव होने के निर्धारित कर्तव्य, धीरे-धीरे सशर्त आत्मा के पापी दिमाग को शुद्ध कर सकते हैं और उसे ज्ञान के चरण तक पहुँचा सकते हैं। ज्ञान प्राप्त करने का शुद्ध चरण भगवान के लिए भक्ति-भावना का आधार बन जाता है। जब तक कोई जीवन की समस्याओं के समाधान पर शोध करने में लगा रहता है, उसका ज्ञान ज्ञान कहलाता है, या शुद्ध ज्ञान, लेकिन जीवन के वास्तविक समाधान का एहसास होने पर व्यक्ति भगवान की भक्ति-भावना में स्थित हो जाता है। भगवद्-गीता आत्मा और पदार्थ के तत्वों के बीच भेद करके जीवन की समस्याओं से शुरू होती है और सभी कारणों और तर्कों से साबित करती है कि आत्मा हर परिस्थिति में अविनाशी है और पदार्थ का बाहरी आवरण, शरीर और दिमाग, भौतिक अस्तित्व के दूसरे शब्द के लिए बदलता रहता है, जो कष्टों से भरा है। इसलिए भगवद्-गीता का उद्देश्य सभी प्रकार के कष्टों को समाप्त करना है, और अर्जुन ने इस महान ज्ञान का आश्रय लिया, जो कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान उन्हें दिया गया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)