श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.15.24 
प्रायेणैतद् भगवत ईश्वरस्य विचेष्टितम् ।
मिथो निघ्नन्ति भूतानि भावयन्ति च यन्मिथ: ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
वास्तव में, यह सब भगवान, भगवान की सर्वोच्च इच्छा के कारण होता है। कभी-कभी लोग एक-दूसरे से मर जाते हैं, और कभी-कभी वे एक-दूसरे की रक्षा करते हैं।
 
In fact, it is all a result of God's will that sometimes people kill each other and sometimes they protect each other.
तात्पर्य
नृवंशविज्ञानियों के अनुसार संघर्ष और योग्यतम की उत्तरजीविता का प्राकृतिक नियम है। पर वे यह नहीं जानते कि प्रकृति के नियम के पीछे परमभगवान का परम निर्देश है। भगवद्-गीता में इसकी पुष्टि की गई है कि प्राकृतिक नियम भगवान के निर्देश में निष्पादित किया जाता है। इसलिए जब भी संसार में शांति होती है, यह समझना चाहिए कि यह भगवान की शुभकामना के कारण है। और जब भी संसार में उथल-पुथल होती है, तो यह भी भगवान की परम इच्छा के कारण है। भगवान की इच्छा के बिना घास का एक भी पत्ता नहीं हिलता। इसलिए जब भी भगवान द्वारा निर्धारित स्थापित नियमों का उल्लंघन होता है, तब मनुष्यों और राष्ट्रों के बीच युद्ध होता है। इसलिए शांति के मार्ग का निश्चित तरीका भगवान के स्थापित नियम के लिए हर चीज का उपयोग करना है। स्थापित नियम यह है कि हम जो कुछ भी करते हैं, जो कुछ भी खाते हैं, जो कुछ भी बलिदान करते हैं या जो कुछ भी दान में देते हैं, वह सब भगवान की पूर्ण संतुष्टि के लिए किया जाना चाहिए। भगवान की इच्छा के विरुद्ध कोई कुछ भी नहीं करना चाहिए, कुछ भी नहीं खाना चाहिए, कुछ भी बलिदान नहीं करना चाहिए और दान में कुछ भी नहीं देना चाहिए। सावधानी साहस का बेहतर हिस्सा है, और व्यक्ति को उन क्रियाओं के बीच अंतर करना सीखना चाहिए जो भगवान को प्रसन्न कर सकें और जो भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकतीं। इस प्रकार एक क्रिया का मूल्यांकन भगवान की प्रसन्नता या अप्रसन्नता से किया जाता है। व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए कोई जगह नहीं है; हमें हमेशा भगवान की प्रसन्नता से निर्देशित होना चाहिए। ऐसी क्रिया को योगः कर्मसु कौशलम कहा जाता है, या उस कार्य को करना जो परमभगवान से जुड़ा हुआ है। वह किसी चीज को पूर्ण रूप से करने की कला है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)