श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.15.17 
सौत्ये वृत: कुमतिनात्मद ईश्वरो मे
यत्पादपद्ममभवाय भजन्ति भव्या: ।
मां श्रान्तवाहमरयो रथिनो भुविष्ठं
न प्राहरन् यदनुभावनिरस्तचित्ता: ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
यह उनकी कृपा ही थी कि जब मैं अपने प्यासे घोड़ों के लिए पानी लेने के लिए रथ से नीचे उतरा था, तब मेरे शत्रुओं ने मेरी जान नहीं ली। यह मेरे प्रभु के प्रति मेरा अनादर ही था कि मैंने उन्हें अपना सारथी बनाने का दुस्साहस किया, क्योंकि मोक्ष प्राप्त करने के लिए श्रेष्ठ पुरुष उनकी पूजा और सेवा करते हैं।
 
It was by His grace that when I got down from my chariot to fetch water for my thirsty horses, my enemies did not bother to kill me. It was because of my disrespect for my Lord that I dared to make Him my charioteer, because the best men worship and serve Him to attain salvation.
तात्पर्य
भगवान श्री कृष्ण, ईश्वर के व्यक्तित्व, ही निराकारवादियों और भगवान के भक्तों दोनों के पूजा पात्र हैं। निराकारवादी उनके दैदीप्यमान तेज की, जो उनकी अनन्त आकृति, आनन्द और ज्ञान के पारलौकिक शरीर से निकलता है, पूजा करते हैं, और भक्त उन्हें परम व्यक्तित्व के रूप में पूजते हैं। जो लोग निराकारवादियों से भी नीचे हैं वे उन्हें महान ऐतिहासिक व्यक्तित्वों में से एक मानते हैं। हालाँकि, भगवान अपने निश्चित पारलौकिक लीलाओं से सभी को आकर्षित करने के लिए अवतरित होते हैं, और इस प्रकार वे सबसे पूर्ण गुरु, मित्र, पुत्र और प्रेमी की भूमिका निभाते हैं। अर्जुन के साथ उनका पारलौकिक संबंध दोस्ती का था, और इसलिए भगवान ने पूरी तरह से भूमिका निभाई, जैसा कि उन्होंने अपने माता-पिता, प्रेमियों और पत्नियों के साथ किया था। इस तरह के पूर्ण पारलौकिक संबंध में खेलते समय, भक्त, भगवान की आंतरिक शक्ति द्वारा भूल जाता है कि उसका मित्र या पुत्र परम व्यक्तित्व है, हालाँकि कभी-कभी भक्त भगवान के कार्यों से चकरा जाता है। भगवान के प्रस्थान के बाद, अर्जुन अपने महान मित्र के प्रति चेतन था, लेकिन अर्जुन की ओर से कोई गलती या भगवान का कोई गलत अनुमान नहीं था। बुद्धिमान लोग अर्जुन जैसे शुद्ध, निष्कलंक भक्त के साथ भगवान के पारलौकिक अभिनय से आकर्षित होते हैं।

युद्ध के मैदान में, पानी की कमी एक सर्वविदित तथ्य है। वहां पानी बहुत दुर्लभ है, और युद्ध के मैदान पर लगातार काम करने वाले जानवरों और मनुष्यों को अपनी प्यास बुझाने के लिए लगातार पानी की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से घायल सैनिकों और सेनापतियों को मृत्यु के समय बहुत प्यास लगती है, और कभी-कभी ऐसा होता है कि केवल पानी की कमी के कारण व्यक्ति को अनिवार्य रूप से मरना पड़ता है। लेकिन कुरुक्षेत्र की लड़ाई में जमीन को बोर करके पानी की इस तरह की कमी को हल किया गया। भगवान की कृपा से, जमीन को बोर करने की सुविधा हो तो किसी भी स्थान से आसानी से पानी प्राप्त किया जा सकता है। आधुनिक प्रणाली जमीन को बोर करने के इसी सिद्धांत पर काम करती है, लेकिन आधुनिक इंजीनियर अभी भी आवश्यकतानुसार तत्काल खुदाई करने में असमर्थ हैं। हालाँकि, पाण्डवों के दिनों से अब तक के इतिहास से पता चलता है कि अर्जुन जैसे बड़े सेनापति एक तेज तीर से केवल सतह की परत में प्रवेश करके कठोर जमीन के नीचे से पानी निकालकर घोड़ों को और क्या कहना पुरुषों को तुरंत पानी की आपूर्ति कर सकते थे, एक ऐसी विधि जो अभी भी आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए अज्ञात है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)