श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.15.16 
यद्दो:षु मा प्रणिहितं गुरुभीष्मकर्ण-
नप्तृत्रिगर्तशल्यसैन्धवबाह्लिकाद्यै: ।
अस्‍त्राण्यमोघमहिमानि निरूपितानि
नोपस्पृशुर्नृहरिदासमिवासुराणि ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
भीष्म, द्रोण, कर्ण, भूरिश्रवा, सुशर्मा, शल्य, जयद्रथ और बाह्लिक जैसे महान सेनापति, उनके अचूक हथियारों से मुझ पर वार करके भी ज़रा सी खरोंच नहीं कर पाए, क्योंकि भगवान कृष्ण की कृपा मुझ पर थी। ठीक उसी तरह प्रह्लाद महाराज जो भगवान नृसिंहदेव की सर्वोच्च भक्ति करने वाले थे, उनके विरुद्ध असुरों ने जो भी हथियारों का इस्तेमाल किया, उन सबका उन पर कोई असर नहीं हुआ था।
 
Great generals like Bhiṣma, Droṇa, Karṇa, Bhurishrava, Suśarma, Shalya, Jayadratha and Bahlika used their infallible weapons against me, but by His (Lord Kṛṣṇa's) grace, they could not harm me even a bit. Similarly, Prahlāda Mahārāja, the great devotee of Lord Nṛsingh Deva, remained unaffected by all the weapons used by the demons.
तात्पर्य
प्रह्लाद महाराज, नृसिंहदेव के महान भक्त के इतिहास को श्रीमद्-भागवतम के सातवें छंद में बताया गया है। प्रह्लाद महाराज, केवल पाँच साल का एक छोटा बच्चा, अपने महान पिता हिरण्यकशिपु से ईर्ष्या का पात्र बन गया, केवल इसलिए कि वह भगवान का शुद्ध भक्त बन गया। राक्षस पिता ने भक्त पुत्र प्रह्लाद को मारने के लिए अपने सभी हथियारों का इस्तेमाल किया, लेकिन भगवान की कृपा से वह अपने पिता के सभी प्रकार के खतरनाक कार्यों से बच गया। उसे आग में, उबलते तेल में, एक पहाड़ी की चोटी से, एक हाथी के पैरों के नीचे फेंका गया था, और उसे जहर दिया गया था। अंत में पिता ने स्वयं अपने पुत्र को मारने के लिए एक कुल्हाड़ी उठाई, और इस प्रकार नृसिंहदेव प्रकट हुए और बेटे की उपस्थिति में जघन्य पिता को मार डाला। इस प्रकार कोई भी भगवान के भक्त को नहीं मार सकता है। इसी प्रकार, अर्जुन को भी भगवान ने बचाया था, हालांकि उनके महान विरोधियों जैसे भीष्म द्वारा सभी खतरनाक हथियारों का इस्तेमाल किया गया था।

कर्नाः सूर्य के देवता से कुंती की शादी से पहले उसके द्वारा जन्म लिया। उसके जन्म के वक्त चारों और चूडियाँ और झुमके बिखरे थे जो एक अपराजित नायक के अनोखे लक्षण थे। शुरू में उसका नाम वसुसेन था, लेकिन जब वह बड़ा हुआ तो उसने अपने चूड़ियाँ और झुमके इंद्र देव को अर्पित कर दिए, और तभी से वह वैकार्तन के नाम से जाना जाने लगा। कुंवारी कुंती से जन्म लेने के बाद उसे गंगा में फेंक दिया गया। बाद में अधिरथ ने उसे उठाया और उसे और उसकी पत्नी राधा ने उसे अपना बच्चा बनाकर पाल पोस के बड़ा किया। कर्ण बहुत दानी था, विशेष रूप से ब्राह्मणों के प्रति। वह ब्राह्माण के लिए कुछ भी नहीं छोड़ सकता था। उसी दान भावना से उसने अपनी प्राकृतिक चूड़ियाँ और झुमके इंद्रदेव को दे दिए, जो उससे बहुत संतुष्ट थे, और बदले में उसे शक्ति नामक एक महान हथियार दिया। उसे द्रोणाचार्य के छात्रों में से एक के रूप में भर्ती कराया गया था, और शुरू से ही उसके और अर्जुन के बीच कुछ प्रतिद्वंद्विता थी। अर्जुन के साथ उसकी निरंतर प्रतिद्वंद्विता को देखकर, दुर्योधन ने उसे अपने साथी के रूप में चुना, और यह धीरे-धीरे अधिक घनिष्ठता में बदल गया। वह द्रौपदी के स्वयंवर समारोह की महान सभा में भी मौजूद था, और जब उसने उस सभा में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का प्रयास किया, तो द्रौपदी के भाई ने घोषणा की कि कर्ण शूद्र बढ़ई का पुत्र होने के कारण प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकता। हालाँकि उसे प्रतियोगिता में मना कर दिया गया था, लेकिन फिर भी जब अर्जुन छत पर मछली के निशाने को भेदने में सफल रहा और द्रौपदी ने अर्जुन को अपनी माला दी, तो कर्ण और अन्य निराश राजकुमारों ने अर्जुन के लिए एक असामान्य बाधा उत्पन्न की, जबकि वह द्रौपदी के साथ जा रहा था। खास तौर पर, कर्ण ने उसके साथ बहुत बहादुरी से लड़ाई की, लेकिन उन सभी को अर्जुन ने हरा दिया। दुर्योधन कर्ण से उसकी अर्जुन के साथ निरंतर प्रतिद्वंद्विता की वजह से बहुत प्रसन्न था, और जब वह सत्ता में था तो कर्ण को अंग राज्य का राजतिलक किया। द्रौपदी को जीतने के अपने प्रयास में विफल होने पर, कर्ण ने दुर्योधन को राजा द्रुपद पर हमला करने की सलाह दी, क्योंकि उसे हराने के बाद अर्जुन और द्रौपदी दोनों को गिरफ्तार किया जा सकता है। लेकिन द्रोणाचार्य ने इस साजिश के लिए उन्हें फटकार लगाई और उन्होंने कार्रवाई से परहेज किया। कर्ण को कई बार हार का सामना करना पड़ा, न केवल अर्जुन ने बल्कि भीमसेन ने भी उसे हराया। वह बंगाल, उड़ीसा और मद्रास के संयुक्त राज्य का राजा था। बाद में उसने महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में सक्रिय भाग लिया, और जब शकुनि द्वारा डिज़ाइन किए गए प्रतिद्वंद्वी भाइयों के बीच जुआ हुआ, तो कर्ण ने खेल में भाग लिया, और जब द्रौपदी को जुए में दांव के रूप में पेश किया गया तो वह बहुत खुश हुआ। इसने उसकी पुरानी शिकायत को दूर किया। जब द्रौपदी खेल में थी तो वह यह खबर घोषित करने के लिए बहुत उत्सुक था, और वही है जिसने दुशासन को पाण्डवों और द्रौपदी दोनों के वस्त्र उतारने का आदेश दिया था। उसने द्रौपदी से दूसरे पति का चयन करने के लिए कहा क्योंकि पाण्डवों द्वारा हारने के कारण उसे कौरवों का गुलाम बना दिया गया था। वह हमेशा पाण्डवों का दुश्मन था, और जब भी कोई मौका मिलता, वह उन्हें हर तरह से अंकुश लगाने की कोशिश करता। कुरुक्षेत्र के युद्ध के दौरान, उसने अंतिम परिणाम का पूर्वाभास किया, और उन्होंने अपनी राय व्यक्त की कि भगवान कृष्ण के अर्जुन के सारथी होने के कारण, अर्जुन को युद्ध जीतना चाहिए। वह हमेशा भीष्म से अलग रहा, और कभी-कभी उसे यह कहने के लिए पर्याप्त गर्व था कि भीष्म अगर अपने कार्य योजना में हस्तक्षेप नहीं करेंगे तो वह पाण्डवों को खत्म कर सकता है। लेकिन भीष्म की मृत्यु के समय वह बहुत शर्मिंदा हुआ। उसने इंद्र देव से प्राप्त शक्ति हथियार से घटोत्कच को मार डाला। उसका बेटा वृषसेन अर्जुन द्वारा मारा गया था। उसने पाण्डव सैनिकों की सबसे बड़ी संख्या को मार डाला। अंत में अर्जुन के साथ एक भीषण युद्ध हुआ, और यह वही था जो अर्जुन के हेलमेट को उतारने में सक्षम था। लेकिन ऐसा हुआ कि उसके रथ का पहिया युद्ध के मैदान की मिट्टी में फंस गया, और जब वह पहिया को ठीक करने के लिए नीचे उतरा, तो अर्जुन ने मौका देखा और उसे मार डाला, हालाँकि उसने अर्जुन से ऐसा न करने का अनुरोध किया।

नप्त, या भूरीश्रवा: भूरीश्रवा कुरु परिवार के सदस्य सोमदत्त के पुत्र थे। उनके दूसरे भाई शल्य थे। दोनों भाई और पिता द्रौपदी के स्वयंवर समारोह में शामिल हुए। उन्होंने अर्जुन की आश्चर्यजनक ताकत की प्रशंसा की, क्योंकि वह भगवान के भक्त मित्र थे। इसलिए भूरीश्रवा ने धृतराष्ट्र के पुत्रों को सलाह दी कि वे उनसे कोई झगड़ा या लड़ाई न करें। ये सभी महाराज युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ में भी शामिल हुए। उनके पास सेना, घुड़सवार सेना, हाथियों और रथों की एक अक्षौहिणी रेजिमेंट थी और ये सभी कुरुक्षेत्र के युद्ध में दुर्योधन के पक्ष से लड़े थे। भीम ने उन्हें एक योधाध्यक्ष के रूप में गिना था। कुरुक्षेत्र के युद्ध में वे विशेष रूप से सात्यकि के साथ लड़े थे और उन्होंने सात्यकि के दस पुत्रों को मार डाला था। बाद में अर्जुन ने उनके हाथ काट दिए और अंततः सात्यकि ने उन्हें मार डाला। उनकी मृत्यु के बाद, वे विश्वदेव के अस्तित्व में विलीन हो गए।

त्रिगर्त, या सुशर्मा: महाराज वृद्धक्षेत्र के पुत्र, वे त्रिगर्तदेश के राजा थे और वे भी द्रौपदी के स्वयंवर समारोह में मौजूद थे। वे दुर्योधन के सहयोगियों में से एक थे और उन्होंने दुर्योधन को मत्स्यदेश (दरभंगा) पर आक्रमण करने की सलाह दी। विराट-नगर में गाय-चोरी के समय वे महाराज विराट को गिरफ्तार करने में सफल रहे लेकिन बाद में भीम ने महाराज विराट को रिहा कर दिया। कुरुक्षेत्र के युद्ध में भी वे बहुत बहादुरी से लड़े, लेकिन अंत में अर्जुन ने उन्हें मार डाला।

जयद्रथ: महाराजा वृद्धक्षेत्र के एक अन्य पुत्र। वह सिंधुदेश (आधुनिक सिंध पाकिस्तान) के राजा थे। उनकी पत्नी का नाम दुःशला था। वह द्रौपदी के स्वयंवर में भी उपस्थित थे और वह दृढ़ता से उनका हाथ पाने के इच्छुक थे लेकिन वह प्रतियोगिता में असफल रहे। लेकिन उसके बाद से उन्होंने हमेशा द्रौपदी के संपर्क में रहने का अवसर ढूंढा। जब वह शाल्यदेश में विवाह करने जा रहे थे, तो काम्यवन के रास्ते में उन्होंने द्रौपदी को फिर से देख लिया और वह उनकी ओर बहुत आकर्षित हुए। पांडव और द्रौपदी तब निर्वासित हो गए थे, जुए में अपना साम्राज्य खोने के बाद, और जयद्रथ ने अपने एक सहयोगी कोटिशष्य के माध्यम से द्रौपदी को गुप्त तरीके से संदेश भेजना बुद्धिमानी समझा। द्रौपदी ने तुरंत जयद्रथ के प्रस्ताव को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया, लेकिन द्रौपदी की सुंदरता से बहुत आकर्षित होने के कारण, उन्होंने बार-बार कोशिश की। हर बार उन्हें द्रौपदी ने मना कर दिया। उसने उसे जबरन अपने रथ पर ले जाने की कोशिश की और पहले तो द्रौपदी ने उसे अच्छी तरह से हराया, और वह कटे हुए जड़ वाले पेड़ की तरह गिर गया। लेकिन वह हतोत्साहित नहीं हुआ और वह द्रौपदी को रथ पर बैठने के लिए मजबूर करने में सफल रहा। यह घटना धौम्य मुनि ने देखी और उन्होंने जयद्रथ की इस हरकत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने रथ का भी पीछा किया और धात्रेयिका के माध्यम से इस मामले को महाराजा युधिष्ठिर के संज्ञान में लाया गया। पांडवों ने तब जयद्रथ के सैनिकों पर हमला किया और उन सभी को मार डाला, और अंत में भीम ने जयद्रथ को पकड़ लिया और उसे बहुत बुरी तरह पीटा, लगभग मार डाला। फिर सिर के पाँच बालों को छोड़कर बाकी सब काट दिए गए और उसे सभी राजाओं के पास ले जाया गया और महाराजा युधिष्ठिर के दास के रूप में पेश किया गया। उसे सभी राजसी आदेशों के समक्ष स्वयं को महाराजा युधिष्ठिर का दास स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया था और उसी हालत में उसे महाराजा युधिष्ठिर के समक्ष लाया गया। महाराजा युधिष्ठिर दयालु थे और उन्होंने उसे छोड़ने का आदेश दिया, और जब उन्होंने महाराजा युधिष्ठिर के अधीन एक श्रद्धांजलि राजकुमार होने की बात स्वीकार की, तो रानी द्रौपदी ने भी उनकी रिहाई की इच्छा की। इस घटना के बाद, उन्हें अपने देश लौटने की अनुमति दी गई। अपमानित होकर, वह हिमालय में गंगोत्री गए और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर प्रकार की तपस्या की। उसने सभी पांडवों को कम से कम एक बार हराने का उससे आशीर्वाद मांगा। तब कुरुक्षेत्र की लड़ाई शुरू हुई, और वह दुर्योधन के साथ हो गया। पहले दिन की लड़ाई में वह महाराजा द्रुपद, फिर विराट और फिर अभिमन्यु से भिड़ा। जबकि अभिमन्यु को मार दिया गया था, सात महान सेनापतियों ने निर्दयतापूर्वक घेर लिया, पांडव उसकी मदद के लिए आए, लेकिन जयद्रथ ने भगवान शिव की कृपा से उन्हें बड़ी कुशलता से खदेड़ दिया। इस पर अर्जुन ने उसे मारने की शपथ ली और यह सुनकर जयद्रथ युद्ध के मैदान को छोड़कर जाना चाहता था और कौरवों से इस कायरतापूर्ण कार्य की अनुमति मांगी। लेकिन उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं दी गई। इसके विपरीत, उसे अर्जुन से लड़ने के लिए बाध्य किया गया था, और जब लड़ाई चल रही थी, भगवान कृष्ण ने अर्जुन को याद दिलाया कि जयद्रथ पर शिव का आशीर्वाद था कि जो कोई भी उसके सिर को जमीन पर गिराएगा, वह तुरंत मर जाएगा। इसलिए उन्होंने अर्जुन को सलाह दी कि जयद्रथ के सिर को सीधे उसके पिता की गोद में फेंक दो, जो समंत-पंचक तीर्थ में तपस्या में लगे थे। अर्जुन ने वास्तव में ऐसा ही किया। जयद्रथ का पिता अपनी गोद में एक कटा हुआ सिर देखकर हैरान रह गया और उसने उसे तुरंत जमीन पर फेंक दिया। पिता की तुरंत मृत्यु हो गई, उसका माथा सात टुकड़ों में फट गया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)