यद्बान्धव: कुरुबलाब्धिमनन्तपार-
मेको रथेन ततरेऽहमतीर्यसत्त्वम् ।
प्रत्याहृतं बहु धनं च मया परेषां
तेजास्पदं मणिमयं च हृतं शिरोभ्य: ॥ १४ ॥
अनुवाद
कौरवों की सेना सागर के समान थी जिसमें अजेय प्राणियों का वास था, इसलिये उस पार जाना असंभव था। किन्तु उनकी मित्रता के कारण रथ पर सवार होकर मैं उसे पार कर सका। उन्हीं की कृपा से मैं गायों को वापस ला सका और बलपूर्वक राजाओं के मुकुट एकत्रित कर सका जिनमें चमकने वाले रत्न जड़े हुए थे।
The military strength of the Kauravas was like the ocean in which many invincible creatures lived. As a result, it was insurmountable. But due to their friendship, I was able to cross it riding on a chariot. It was due to their grace that I was able to bring back the cows and forcefully collect all the crowns of the kings, which were studded with gems, the source of all brilliance.
तात्पर्य
कौरव पक्ष में भीष्म, द्रोण, कृपा, कर्ण आदि अनेक पराक्रमी सेनापति थे और उनकी सेना समुद्र के समान दुर्जेय थी। फिर भी भगवान कृष्ण की कृपा से रथ पर बैठे हुए अर्जुन ही उन्हें एक−एक करके सरलता से जीतते गए। उस ओर कई बार सेनापति बदलते रहे, परन्तु पाण्डव पक्ष से केवल अर्जुन ही भगवान कृष्ण के सारथी रूप में रथ पर बैठकर महाभारत का सारा भार संभालते रहे। इसी प्रकार जब पाण्डव विराट की राजसभा में अज्ञानावस्था में रहते थे, तब कौरवों ने राजा विराट से छल किया था और उनकी बहुत-सी गायें ले जाने के निश्चय से लड़ने आए थे। उसी समय गौ-हरण के लिए आए कौरवों से अर्जुन ने अपनी अज्ञात स्थिति में ही युद्ध किया और उनकी गायों को छुड़ाने सहित राजचिन्ह में लगे हुए रत्न भी वे लूट लाए। अर्जुन ने याद किया कि यह सब आपको कृपा से ही सम्भव हो पाया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥