जब भक्त संकट में पड़ जाते हैं तो उन्हें गहन भाव से भगवान का स्मरण करने का अवसर प्राप्त होता है। अतः द्रौपदी उस दारुण स्थिति में भगवान कृष्ण का चिन्तन कर रही थी और व्यापक भगवान तत्क्षण अपने भक्तों की दारुण स्थिति को जान गये। इसलिए वे वहाँ घटनास्थल पर आये और द्रौपदी से पूछा कि उनके पास जो भी भोजन हो उसे दे दो। भगवान द्वारा ऐसे आग्रह किये जाने पर द्रौपदी को दुःख हुआ क्योंकि सर्वोच्च भगवान ने उनसे भोजन माँगा था और वे उसे देने में उस समय असमर्थ थीं। उन्होंने भगवान से कहा कि सूर्य देव से प्राप्त रहस्यमयी भोजन किसी भी मात्रा में भोजन उपलब्ध करा सकता था यदि उन्होंने स्वयं भोजन नहीं किया होता। परन्तु उस दिन उन्होंने पहले ही भोजन कर लिया था और इसलिए वे खतरे में थीं। अपनी कठिनाइयों को व्यक्त करने से वे भगवान के सामने उसी तरह रोने लगीं जैसे केवल एक स्त्री ऐसी परिस्थिति में करेगी। हालाँकि भगवान ने द्रौपदी से खाने के बर्तनों को लाने के लिए कहा ताकि देखें कि भोजन का कोई कण शेष तो नहीं है और जब द्रौपदी ने ऐसा किया तो भगवान ने पाया कि बर्तन से लगी हुई सब्ज़ी का कुछ कण था। भगवान ने तुरंत उसे उठाकर खा लिया। ऐसा करने के बाद भगवान ने द्रौपदी से कहा कि अपने अतिथियों को बुलाओ, दुर्वासा की संगति।
भूम को उन्हें नदी से बुलाने के लिए भेजा गया। भीम ने कहा, आप लोग विलम्ब क्यों कर रहे हैं? आइये, भोजन आपके लिए तैयार है। परन्तु भगवान कृष्ण द्वारा थोड़ा-सा भोजन स्वीकार करने के कारण ब्राह्मण, यहाँ तक कि जब वे पानी में ही थे, उन्होंने महसूस किया कि उनका बहुत अच्छा भोजन हुआ। उन्होंने सोचा कि महाराज युधिष्ठिर ने निश्चित रूप से उनके लिए कई मूल्यवान व्यंजन तैयार किये होंगे और चूँकि वे भूखे नहीं थे और खा नहीं सकते थे इसलिए राजा को बहुत दुःख होगा अतः वहाँ न जाना ही बेहतर है। इस प्रकार उन्होंने जाने का निर्णय लिया।
यह घटना साबित करती है कि भगवान महानतम रहस्यवादी हैं और इसलिए उन्हें योगेश्वर के रूप में जाना जाता है। अन्य निर्देश यह है कि प्रत्येक गृहस्थ को भगवान को भोजन अर्पित करना चाहिए और परिणाम यह होगा कि सभी व्यक्ति, यहाँ तक दस हज़ार की संख्या में अतिथियों का समूह भी सन्तुष्ट होगा क्योंकि भगवान सन्तुष्ट हैं। यह भक्ति सेवा का तरीका है।
