"जब भी और जहां भी धार्मिक आचरण में गिरावट आती है, हे भरत के वंशज, और अधर्म का प्रबल उदय होता है - उस समय मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।" (भगवद्-गीता 4.7)
"भक्तों को मुक्ति दिलाने के लिए, दुष्टों का नाश करने के लिए और व्यवसाय के सिद्धांतों को पुनः स्थापित करने के लिए, मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ।" (भगवद्-गीता 4.8)
"यदि मैं काम करना बंद कर दूं, तो सभी मानवता गुमराह हो जाएगी। मैं अवांछित आबादी बनाने का कारण भी बनूंगा, और इस प्रकार मैं सभी संवेदनशील प्राणियों की शांति को नष्ट कर दूंगा।" (भगवद्-गीता 3.24)
"जो भी कार्य महान पुरुष करता है, साधारण लोग उसका अनुसरण करेंगे। और जो भी मानक वह अनुकरणीय कार्यों द्वारा निर्धारित करता है, उसे पूरा विश्व अपनाता है।" (भगवद्-गीता 3.21)
भगवान के उपरोक्त सभी कथन भगवान के विभिन्न पूर्ण अंशों पर लागू होते हैं, अर्थात् उनके विस्तार जैसे संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और नारायण। ये सभी अलग-अलग अलौकिक विस्तारों में स्वयं ही हैं, और फिर भी भगवान श्री कृष्ण के रूप में भक्तों के विभिन्न ग्रेड के साथ अलौकिक आदान-प्रदान के एक अलग क्षेत्र में कार्य करते हैं। और फिर भी भगवान कृष्ण जैसे वह हैं, ब्रह्मा के समय के प्रत्येक चौबीस घंटे (या 8,640,000,000 सौर वर्षों के अंतराल के बाद) प्रत्येक ब्रह्मांड में प्रकट होते हैं, और उनके सभी अलौकिक शगल प्रत्येक ब्रह्मांड में एक नियमित स्पूल में प्रदर्शित होते हैं। लेकिन उस नियमित स्पूल में भगवान कृष्ण, भगवान वासुदेव, आदि के कार्य आम आदमी के लिए जटिल समस्याएँ हैं। भगवान के स्वयं और भगवान के अलौकिक शरीर में कोई अंतर नहीं है। विस्तार विभेदक गतिविधियों को निष्पादित करते हैं। हालाँकि, जब भगवान भगवान श्री कृष्ण के रूप में अपने व्यक्ति में प्रकट होते हैं, तो उनके अन्य पूर्ण अंश भी उनके द्वारा योगमाया नामक उनकी अकल्पनीय शक्ति से उनमें शामिल हो जाते हैं, और इस प्रकार वृंदावन के भगवान कृष्ण मथुरा के भगवान कृष्ण या द्वारका के भगवान कृष्ण से अलग हैं। भगवान कृष्ण का विराट रूप भी अपनी अकल्पनीय शक्ति से उनसे अलग है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में प्रदर्शित विराट रूप उनके रूप की भौतिक अवधारणा है। इसलिए यह समझना चाहिए कि जब भगवान कृष्ण को शिकारी के धनुष और बाण से मार दिया गया था, तो भगवान ने भौतिक संसार में अपने तथाकथित भौतिक शरीर को छोड़ दिया था। भगवान कैवल्य हैं, और उनके लिए पदार्थ और आत्मा में कोई अंतर नहीं है क्योंकि सब कुछ उन्हीं से बना है। इसलिए उनके एक प्रकार के शरीर को छोड़ने या दूसरे शरीर को स्वीकार करने का मतलब यह नहीं है कि वह साधारण जीवित प्राणी की तरह हैं। ऐसी सभी गतिविधियाँ उनकी अकल्पनीय शक्ति से एक साथ एक और अलग हैं। जब महाराजा युधिष्ठिर उनके गायब होने की संभावना पर विलाप कर रहे थे, तो यह केवल एक महान मित्र के गायब होने पर विलाप करने की प्रथा के अनुसार था, लेकिन तथ्य की बात यह है कि भगवान कभी भी अपने अलौकिक शरीर को नहीं छोड़ते, जैसा कि कम बुद्धिमान व्यक्तियों द्वारा गलत समझा जाता है। ऐसे कम बुद्धिमान व्यक्तियों की भगवान ने स्वयं भगवद्-गीता में निंदा की है, और उन्हें मूढ़ कहा जाता है। भगवान का अपने शरीर को छोड़ने का मतलब है कि उन्होंने अपने पूर्ण अंशों को संबंधित धामों (अलौकिक निवास) में फिर से छोड़ दिया, जैसे उन्होंने अपने विराट रूप को भौतिक संसार में छोड़ दिया।
