श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.14.41 
कच्चित्त्वं ब्राह्मणं बालं गां वृद्धं रोगिणं स्त्रियम् ।
शरणोपसृतं सत्त्वं नात्याक्षी: शरणप्रद: ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
तुम सदा से योग्य जीवों के रक्षक रहे हो, जैसे ब्राह्मण, बच्चे, गायें, स्त्रियाँ और बीमार। क्या तुम उन्हें शरण न दे सकते थे जब वे तुम्हारे पास आश्रय मांगने आए थे?
 
You have always been the protector of deserving beings such as brahmins, children, cows, women and the sick. Could you not give them shelter when they sought shelter?
तात्पर्य
वे ब्राह्मण जो सदैव समाज कल्याण कार्यों के लिए भौतिक और आध्यात्मिक दोनों रूपों में ज्ञान की खोज में लगे रहते हैं, हर तरह से राजा के संरक्षण के पात्र हैं। इसी प्रकार, राज्य के बच्चे, गाय, रोगी व्यक्ति, महिला और बुजुर्ग व्यक्ति विशेष रूप से राज्य या क्षत्रिय राजा के संरक्षण की आवश्यकता होती है। यदि ऐसे जीवों को क्षत्रिय, या शाही आदेश या राज्य द्वारा सुरक्षा नहीं मिलती है, तो यह निश्चित रूप से क्षत्रिय या राज्य के लिए शर्मनाक है। यदि अर्जुन के साथ वास्तव में ऐसी चीजें हुई थीं, तो महाराज युधिष्ठिर इन विसंगतियों के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)