कच्चिन्नाभिहतोऽभावै: शब्दादिभिरमङ्गलै: ।
न दत्तमुक्तमर्थिभ्य आशया यत्प्रतिश्रुतम् ॥ ४० ॥
अनुवाद
क्या किसी ने आपको अप्रिय वचन कहकर या आपको डरा-धमका कर आपका अपमान किया? क्या आप किसी याचक को दान नहीं दे सके? या किसी से किया हुआ वादा नहीं निभा सके?
Has anyone used abusive language against you? Or threatened you? Have you been unable to give alms to a beggar? Or have you been unable to keep your promise to someone?
तात्पर्य
एक क्षत्रिय या धनी व्यक्ति को कभी-कभी ऐसे लोगों द्वारा मिलने जाते हैं जिन्हें धन की आवश्यकता होती है। जब उनसे दान माँगा जाता है, तो धन के स्वामी का कर्तव्य होता है कि वह उस व्यक्ति, स्थान और समय को ध्यान में रखते हुए दान करें। यदि कोई क्षत्रिय या धनी व्यक्ति इस दायित्व का पालन करने में विफल रहता है, तो उसे इस विसंगति के लिए बहुत खेद होना चाहिए। इसी तरह, किसी को भी दान करने के अपने वादे को पूरा करने में विफल नहीं होना चाहिए। ये विसंगतियाँ कभी-कभी निराशा का कारण बनती हैं, और इस प्रकार विफल होने पर, एक व्यक्ति आलोचना का पात्र बन जाता है, जो अर्जुन की दुर्दशा का कारण भी हो सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥