कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे ।
अलब्धमानोऽवज्ञात: किं वा तात चिरोषित: ॥ ३९ ॥
अनुवाद
मेरे भ्राता अर्जुन, तुम बताओ कि तुम्हारा स्वास्थ्य तो ठीक है न? ऐसा लगता है कि तुम्हारी काया की चमक खो गई है। क्या द्वारका में बहुत समय से रहने की वजह से दूसरों ने तुम्हारा मान-सम्मान और विचार करना बंद कर दिया है? क्या इसलिए तुम ऐसे हो गए हो?
My brother Arjuna, tell me if your health is good? It seems that your body has lost its glow. Is this because of staying in Dwaraka for a long time and being disrespected and ignored by others?
तात्पर्य
सभी दृष्टिकोंणों से, महाराजा ने अर्जुन से द्वारका के कल्याण के बारे में पूछताछ की, लेकिन उन्होंने अंत में निष्कर्ष निकाला कि जब तक स्वयं भगवान श्री कृष्ण वहाँ थे, तब तक कोई भी अशुभ घटना नहीं हो सकती थी। लेकिन उसी समय, अर्जुन अपने शारीरिक तेज से रहित दिखाई दे रहा था, और इसलिए राजा ने उनके व्यक्तिगत कल्याण के बारे में पूछताछ की और इतने सारे महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥