श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  1.14.38 
यद्बाहुदण्डाभ्युदयानुजीविनो
यदुप्रवीरा ह्यकुतोभया मुहु: ।
अधिक्रमन्त्यङ्‌घ्रिभिराहृतां बलात्
सभां सुधर्मां सुरसत्तमोचिताम् ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
सर्वश्रेष्ठ यदुवंशी वीर, भगवान श्री कृष्ण की भुजाओं से सुरक्षित रहकर, सदैव प्रत्येक प्रकार से निर्भय रहते हैं। और इसलिए, उनके पैर सुधर्मा सभा-भवन पर पड़ते रहते हैं, जो सर्वश्रेष्ठ देवताओं के लिए था, लेकिन जिसे उनसे छीन लिया गया था।
 
The great warriors of the Yaduvanshi clan remain fearless in every way by being protected by the arms of Lord Krishna. Therefore, their feet keep falling in the assembly hall of that Sudharma, which is meant for the best of the gods, but which was taken away from them.
तात्पर्य
जो लोग भगवान के प्रत्यक्ष सेवक होते हैं, उन्हें भगवान हर तरह से भय से बचाते हैं और उन्हें यथेष्ट चीज़ों का सुख भी मिलता है, चाहे वे जबरदस्ती एकत्रित की गई हों। भगवान सभी जीवों के प्रति व्यवहार में समान होते हैं, लेकिन वे अपने शुद्ध भक्तों के प्रति पक्षपाती होते हैं और उनके प्रति बहुत स्नेह रखते हैं। द्वारका नगरी संपन्न थी और भौतिक जगत की सर्वोत्तम चीज़ों से समृद्ध थी। राजकीय सम्मेलन कक्ष किसी विशेष राज्य के गौरव के अनुसार बनाया जाता है। स्वर्गीय ग्रहों में, सुधर्मा नामक राजकीय सम्मेलन भवन सभी देवताओं के सम्मान के योग्य था। ऐसा सम्मेलन कक्ष कभी भी पृथ्वी पर किसी राज्य के लिए नहीं होता है क्योंकि पृथ्वी पर रहने वाला मनुष्य उसका निर्माण करने में असमर्थ है, भले ही कोई भी विशेष राज्य भौतिक रूप से कितना भी उन्नत हो। लेकिन भगवान कृष्ण के पृथ्वी पर रहने के समय, यादव परिवार के सदस्यों ने जबरदस्ती स्वर्गीय सम्मेलन कक्ष को पृथ्वी पर लाकर द्वारका में रख दिया। वे इसलिए ऐसा कर सके क्योंकि उन्हें परम भगवान कृष्ण की संतुष्टि और सुरक्षा का पूरा विश्वास था। दूसरे शब्दों में, भगवान को उनके शुद्ध भक्तों द्वारा ब्रह्मांड की श्रेष्ठ चीज़ों से सुसज्जित किया जाता है। भगवान कृष्ण को यादव वंश के सदस्यों द्वारा ब्रह्मांड के भीतर उपलब्ध सभी प्रकार के आराम और सुविधाएँ प्रदान की गईं और बदले में, भगवान के ऐसे सेवकों को संरक्षित और निडर रखा गया। भूलने वाली और वातानुकूलित आत्मा भयभीत होती है। लेकिन एक मुक्त आत्मा कभी भयभीत नहीं होती, जैसे कि अपने पिता की दया पर पूरी तरह से निर्भर एक छोटा बच्चा कभी किसी से नहीं डरता। भयभीत होना जीव के लिए एक तरह का भ्रम है जब वह सोया होता है और भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध को भूल जाता है। चूँकि जीव कभी मरता नहीं है, जैसा कि भगवद-गीता (2.20) में कहा गया है, तो फिर डर का क्या कारण है? एक व्यक्ति सपने में बाघ से डर सकता है, लेकिन दूसरा व्यक्ति जो उसकी बगल में सो रहा है उसे कोई बाघ नहीं दिखाई देता। बाघ उन दोनों के लिए एक मिथक है, अर्थात् सपना देखने वाला व्यक्ति और जागा हुआ व्यक्ति, क्योंकि वास्तव में कोई बाघ नहीं होता है; लेकिन जो मनुष्य अपने जागृत जीवन को भूल जाता है वह डरता है, जबकि जो मनुष्य अपनी स्थिति को नहीं भूला है, वह बिल्कुल भी नहीं डरता है। इस प्रकार, यादव वंश के सदस्य भगवान की सेवा में पूरी तरह से सचेत थे, और इसलिए उनके पास कभी भी ऐसा कोई बाघ नहीं था जिससे उन्हें डरना पड़े। भले ही कोई असली बाघ होता, लेकिन भगवान उन्हें बचाने के लिए वहाँ मौजूद थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)