समस्त सेवाओं में सर्वश्रेष्ठ, भगवान के चरणकमलों की सेवा करने के रूप में, सत्यभामा के नेतृत्व में द्वारका की रानियाँ अपने सेवा-भाव से भगवान को देवताओं पर विजय दिलाने के लिए प्रेरित करती थीं। इससे वे उन सुख-सुविधाओं का आनंद प्राप्त करती थीं, जो वज्र के स्वामी की पत्नियों का विशेषाधिकार होता है।
By simply serving the Lord's feet, which is the most important of all services, the queens, under the supervision of Satyabhama in Dvaraka, inspired the Lord to conquer the demigods. Thus the queens are enjoying the same things that are enjoyed by the wives of the controller of thunderbolts.
तात्पर्य
सत्यभामा: द्वारका में भगवान श्री कृष्ण की प्रमुख रानियों में से एक थी। नरकासुर का वध करने के बाद, भगवान कृष्ण सत्यभामा के साथ नरकासुर के महल गए। वह सत्यभामा के साथ इंद्रलोक भी गए, और उनका स्वागत शचीदेवी ने किया, जिन्होंने उन्हें देवताओं की माँ, अदिति से मिलवाया। अदिति सत्यभामा से बहुत खुश हुईं, और उन्होंने उन्हें उस वरदान का आशीर्वाद दिया कि जब तक भगवान कृष्ण पृथ्वी पर रहेंगे, तब तक उनकी युवावस्था स्थायी रहेगी। अदिति उन्हें अपने साथ स्वर्ग के ग्रहों में देवताओं के विशेषाधिकार दिखाने के लिए ले गईं। जब सत्यभामा ने पारिजात का फूल देखा, तो वह इसे द्वारका के अपने महल में रखना चाहती थीं। उसके बाद, वह अपने पति के साथ वापस द्वारका आईं और अपने महल में पारिजात का फूल रखने की इच्छा व्यक्त की। सत्यभामा का महल विशेष रूप से मूल्यवान रत्नों से सजाया गया था, और गर्मियों के सबसे गर्म मौसम में भी महल के अंदर ठंडा रहता था, जैसे कि वातानुकूलित हो। उन्होंने अपने महल को विभिन्न झंडों से सजाया, जिसमें उनके महान पति की उपस्थिति की खबर थी। एक बार, अपने पति के साथ, वह द्रौपदी से मिलीं, और वह अपने पति को खुश करने के तरीके में द्रौपदी द्वारा निर्देशित होने की इच्छुक थीं। द्रौपदी इस मामले में विशेषज्ञ थीं क्योंकि उन्होंने पांच पतियों, पाण्डवों की ज़रूरत पूरी की, और सभी उनसे बहुत खुश थे। द्रौपदी के निर्देश प्राप्त करने पर, वह बहुत खुश हुई और अपनी शुभकामनाएँ अर्पित कीं और द्वारका लौट गईं। वह सत्राजित की बेटी थीं। भगवान कृष्ण के जाने के बाद, जब अर्जुन ने द्वारका का दौरा किया, तो सत्यभामा और रुक्मिणी समेत सभी रानियों ने महान भावना के साथ भगवान के लिए विलाप किया। अपने जीवन के अंतिम चरण में, वह कठोर तपस्या करने के लिए जंगल के लिए निकल पड़ीं। सत्यभामा ने अपने पति को स्वर्गीय ग्रहों से पारिजात का फूल प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया, और भगवान ने इसे देवताओं से बलपूर्वक प्राप्त किया, जैसे एक आम पति अपनी पत्नी को खुश करने के लिए चीज़ें सुरक्षित करता है। जैसा कि पहले ही बताया गया है, इतनी सारी पत्नियों के साथ अपनी आज्ञाओं को एक साधारण व्यक्ति की तरह पूरा करने के लिए भगवान को बहुत कम करना पड़ा। लेकिन क्योंकि रानियों ने भक्ति सेवा की उच्च गुणवत्ता को स्वीकार किया, अर्थात् भगवान को सभी सुख प्रदान करना, भगवान ने एक वफादार और पूर्ण पति की भूमिका निभाई। कोई भी सांसारिक प्राणी स्वर्गीय राज्य से चीजों की अपेक्षा नहीं कर सकता, विशेष रूप से पारिजात के फूल, जो केवल देवताओं द्वारा उपयोग किए जाने हैं। परंतु भगवान की पत्नियाँ बनने के कारण, उन सभी ने स्वर्ग के निवासियों की महान पत्नियों के विशेषाधिकारों का आनंद लिया। दूसरे शब्दों में, चूंकि भगवान अपनी सृष्टि के भीतर हर चीज़ के स्वामी हैं, इसलिए द्वारका की रानियों के लिए ब्रह्मांड के किसी भी हिस्से से कोई भी दुर्लभ चीज़ प्राप्त करना बहुत आश्चर्यजनक नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥