क्या भगवान श्री कृष्ण, जो पूर्ण पुरूषोत्तम हैं, गायों, इन्द्रियों और ब्राह्मणों को आनंद प्रदान करने वाले हैं और अपने भक्तों के प्रति अत्यंत दयालु हैं, अपने मित्रों से घिरे हुए, द्वारकापुरी में पवित्र सभा का आनंद ले रहे हैं?
The Supreme Personality of Godhead, Sri Krishna, who is the giver of joy to the cows, the senses and the brahmanas and who is extremely affectionate towards His devotees, is enjoying the holy assembly in Dvarakapuri, surrounded by His friends, isn't it?
तात्पर्य
इस विशिष्ट छंद में भगवान को भगवान, गोविंद, ब्राह्मण्य और भक्त वत्सल के रूप में वर्णित किया गया है। वह स्वयं भगवान हैं, या मूल परम भगवान, जो सभी वैभव, सभी शक्ति, सभी ज्ञान, सभी सौंदर्य, सभी प्रसिद्धि और सभी त्याग से परिपूर्ण हैं। कोई भी उनके बराबर या उनसे बड़ा नहीं है। वे गोविंद हैं क्योंकि वे गायों और इंद्रियों का आनंद हैं। जिन्होंने भगवान की भक्ति सेवा द्वारा अपनी इंद्रियों को पवित्र कर दिया है, वे ही उन्हें वास्तविक सेवा प्रदान कर सकते हैं और इस प्रकार ऐसी पवित्र इंद्रियों से अलौकिक आनंद प्राप्त कर सकते हैं। केवल अशुद्ध सशर्त व्यक्ति ही इंद्रियों से कोई आनंद प्राप्त नहीं कर सकते हैं, लेकिन इंद्रियों के झूठे सुखों से भ्रमित होकर, वे इंद्रियों के सेवक बन जाते हैं। इसलिए, हमें अपने हित के लिए उनकी सुरक्षा की आवश्यकता है। प्रभु गाय और ब्राह्मण संस्कृति के रक्षक हैं। गायों की रक्षा और ब्राह्मण संस्कृति से रहित समाज प्रभु के प्रत्यक्ष संरक्षण में नहीं है, जैसे जेलों में कैदी राजा के संरक्षण में नहीं हैं बल्कि राजा के एक कठोर एजेंट के संरक्षण में हैं। गायों की रक्षा किए बिना और समाज के कम से कम कुछ सदस्यों के लिए, मानव समाज में ब्राह्मण गुणों की खेती किए बिना, कोई भी मानव सभ्यता किसी भी लंबाई में समृद्ध नहीं हो सकती है। ब्राह्मण संस्कृति द्वारा, अच्छाई के निष्क्रिय गुणों का विकास, अर्थात् सत्यता, समता, इंद्रिय नियंत्रण, सहनशीलता, सादगी, सामान्य ज्ञान, पारलौकिक ज्ञान और वैदिक ज्ञान में दृढ़ विश्वास, व्यक्ति ब्राह्मण बन सकता है और इस प्रकार भगवान को देख सकता है कि वे हैं। और ब्राह्मण पूर्णता को पार करने के बाद, व्यक्ति को प्रभु का भक्त बनना होता है ताकि मालिक, स्वामी, मित्र, पुत्र और प्रेमी के रूप में उनके प्रेमपूर्ण स्नेह को स्थानांतरित किया जा सके। एक भक्त की अवस्था, जो प्रभु के पारलौकिक स्नेह को आकर्षित करती है, तब तक विकसित नहीं होती जब तक कि किसी ने ऊपर वर्णित ब्राह्मण के गुणों को विकसित नहीं किया होता। भगवान गुणवत्ता के ब्राह्मण की ओर झुके हुए हैं और झूठी प्रतिष्ठा के नहीं। जो योग्यता के मामले में ब्राह्मण से कम हैं वे प्रभु के साथ कोई संबंध स्थापित नहीं कर सकते हैं, जैसे लकड़ी के बिना कच्ची धरती से आग नहीं जलाई जा सकती, यद्यपि लकड़ी और पृथ्वी के बीच संबंध है। चूँकि प्रभु स्वयं में सम्पूर्ण हैं, इसलिए उनके कल्याण का कोई प्रश्न नहीं हो सकता, और महाराज युधिष्ठिर ने यह प्रश्न पूछने से परहेज किया। उन्होंने बस अपने निवास स्थान, द्वारका पुरी के बारे में पूछताछ की, जहाँ पवित्र व्यक्ति इकट्ठा होते हैं। प्रभु वहीं रहते हैं जहाँ पवित्र लोग इकट्ठा होते हैं और परम सत्य की महिमा करने में आनंद लेते हैं। महाराज युधिष्ठिर को द्वारका शहर में पवित्र लोगों और उनके पवित्र कार्यों के बारे में जानने की उत्सुकता थी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥