वह योगी जिसने आसनों और श्वास लेने की क्रिया में सिद्धि प्राप्त कर ली है, अपनी इंद्रियों को पूर्ण ईश्वर की ओर मोड़कर भौतिक प्रकृति के गुणों जैसे सत्व, रज और तमस के दूषणों से मुक्त हो जाता है।
One who has mastered the yogic postures and breathing technique, turning his senses towards the Supreme Personality of Godhead, becomes detached from the contamination of the modes of material nature, namely, the modes of goodness, passion and ignorance.
तात्पर्य
योगमार्ग के प्रारंभिक कार्यों में आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा आदि होते हैं। महाराज धृतराष्ट्र को इन प्रारंभिक कार्यों में सफलता प्राप्त होगी, क्योंकि वे एक पवित्र स्थान पर बैठे थे और एक उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित कर रहे थे, अर्थात भगवान (हरि) पर। इस प्रकार उनकी सभी इंद्रियाँ भगवान की सेवा में संलग्न हो रही थीं। इस प्रक्रिया में भगवान की आराधना करने वालों को प्रकृति की तीनों भौतिक प्रकृति के दोषों से निजात पाने में मदद मिलती है। यहाँ तक कि सबसे ऊँची श्रेणी, सात्विक प्रकृति भी भौतिक बंधन का कारण है, और अन्य गुणों के बारे में क्या कहना है, जैसे कि राजस और तामस। राजसी और तामसिक प्रकृति भौतिक भोग की इच्छा को बढ़ा देती है, और कामना की तीव्र भावना धन और शक्ति के संचय को बढ़ावा देती है। जिसने इन दोनों आधार मानसिकताओं पर विजय पा ली है और खुद को सद्गुणों के मंच तक उठा लिया है, जो ज्ञान और नैतिकता से भरा है, वह भी इंद्रियों, अर्थात आँखों, जीभ, नाक, कान और स्पर्श को नियंत्रित नहीं कर सकता है। लेकिन जिसने खुद को भगवान हरि के चरण कमलों में समर्पित कर दिया है, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, वह भौतिक प्रकृति के सभी दोषों से ऊपर उठ सकता है और भगवान की सेवा में स्थिर रह सकता है। इसलिए, भक्ति-योग प्रक्रिया सीधे इंद्रियों को भगवान की प्रेमपूर्ण सेवा के लिए नियोजित करती है। यह भौतिक क्रियाकलापों में संलग्न होने से रोकता है। इंद्रियों को भौतिक लगाव से मोड़कर भगवान की प्रेमपूर्ण सेवा की ओर ले जाने की प्रक्रिया को प्रत्याहार कहा जाता है, और यही प्रक्रिया प्राणायाम कहलाती है, अंततः समाधि में समाप्त होती है, या हर तरह से सर्वोच्च भगवान हरि को प्रसन्न करने में निमग्नता में समाप्त होती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥