बैल जिस प्रकार लम्बी रस्सी से नाक में नथनी पहनकर बंधन में रहता है, उसी प्रकार मनुष्य जाति वैदिक विधि-विधानों से बंधकर परमात्मा के आदेशों का पालन करने को बाध्य है।
Just as a bull is bound by a long rope tied to its nose, similarly the human race is bound by various Vedic injunctions and is forced to obey the orders of the Supreme Lord.
तात्पर्य
हर जीव, चाहे वह इंसान हो या जानवर या पक्षी, सोचता है कि वह अपने आप में ही स्वतंत्र है, लेकिन वास्तव में कोई भी प्रभु के कड़े नियमों से मुक्त नहीं है। प्रभु के नियम इसलिए सख्त हैं क्योंकि किसी भी हालत में उनकी अवहेलना नहीं की जा सकती। मानव निर्मित नियमों को चालाक कानून तोड़ने वाले टाल सकते हैं, लेकिन सर्वोच्च विधायक के नियमों में नियमों की अवहेलना करने की जरा सी भी संभावना नहीं होती। ईश्वर निर्मित कानून के रास्ते से ज़रा सा भी विचलित होने से नियम तोड़ने वाले को जानलेवा खतरा हो सकता है। प्रभु के ऐसे कानूनों को आमतौर पर अलग-अलग परिस्थितियों में धर्म के नियमों के रूप में जाना जाता है, लेकिन हर जगह धर्म का सिद्धांत एक ही है, अर्थात् परमेश्वर, धर्म के नियमों की आज्ञाओं का पालन करना। यही भौतिक अस्तित्व की शर्त है। भौतिक दुनिया के सभी जीवों ने अपनी इच्छा से ही सशर्त जीवन का जोखिम उठाया है और इस तरह वे भौतिक प्रकृति के नियमों में फँस गए हैं। इस उलझाव से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका है कि परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने के लिए सहमत हुआ जाए। लेकिन माया या मोह के चंगुल से मुक्त होने के बजाय, मूर्ख इंसान अलग-अलग नामकरण से बंध जाते हैं, उन्हें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, हिंदू, मुसलमान, भारतीय, यूरोपीय, अमेरिकी, चीनी और कई अन्य नाम दिए जाते हैं, और इस तरह वे संबंधित धर्मग्रंथों या विधानों के प्रभाव में प्रभु के आदेशों का पालन करते हैं। राज्य के वैधानिक कानून धार्मिक संहिताओं की अपूर्ण नकल हैं। धर्मनिरपेक्ष राज्य या ईश्वरविहीन राज्य, नागरिकों को भगवान के नियमों को तोड़ने की अनुमति देता है, लेकिन उन्हें राज्य के नियमों की अवहेलना करने से रोकता है; परिणाम यह होता है कि सामान्य लोग मानव द्वारा बनाए गए अपूर्ण कानूनों का पालन करने के बजाय भगवान के कानूनों को तोड़कर अधिक दुख उठाते हैं। भौतिक अस्तित्व की परिस्थितियों में, संविधान के अनुसार हर इंसान अपूर्ण होता है, और इस बात की ज़रा सी भी संभावना नहीं है कि भौतिक रूप से सबसे उन्नत इंसान भी परिपूर्ण कानून बना सकता है। दूसरी ओर, ईश्वर के नियमों में ऐसी कोई अपूर्णता नहीं है। यदि नेताओं को ईश्वर के कानूनों में शिक्षित किया जाता है, तो बिना उद्देश्य वाले लोगों की कानून बनाने वाली परिषद की कोई आवश्यकता नहीं है। इंसानों के अस्थायी कानूनों में बदलाव की आवश्यकता है, लेकिन ईश्वर द्वारा बनाए गए कानूनों में कोई बदलाव नहीं होता क्योंकि वे पूर्ण परमेश्वर के व्यक्तित्व द्वारा परिपूर्ण रूप से बनाए गए हैं। धर्म के नियम, धर्मग्रंथों के आदेश, ईश्वर के मुक्त हुए प्रतिनिधियों द्वारा जीने की विभिन्न परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं, और प्रभु के आदेशों का पालन करके, सशर्त जीवित प्राणी धीरे-धीरे भौतिक अस्तित्व के चंगुल से मुक्त हो जाते हैं। हालाँकि, जीव का वास्तविक स्थान यह है कि वह परमेश्वर का शाश्वत सेवक है। अपनी मुक्त अवस्था में वह प्रभु की अलौकिक प्रेम में सेवा करता है और इस तरह उसे पूर्ण स्वतंत्रता का जीवन मिलता है, यहाँ तक कि कई बार प्रभु के बराबर या उनसे भी अधिक होता है। लेकिन सशर्त भौतिक दुनिया में, हर जीव अन्य जीवों का प्रभु बनना चाहता है, और इस तरह माया के भ्रम से प्रभुत्व प्राप्त करने की यह मानसिकता सशर्त जीवन के और विस्तार का कारण बन जाती है। इसलिए भौतिक दुनिया में जीव और अधिक सशर्त हो जाता है, जब तक कि वह अपनी शाश्वत सेवक वाली मूल स्थिति को पुनर्जीवित करके प्रभु के सामने समर्पण नहीं कर देता। यही भगवद गीता और दुनिया के अन्य सभी मान्यता प्राप्त धर्मग्रंथों का आखिरी निर्देश है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥