अपि न: सुहृदस्तात बान्धवा: कृष्णदेवता: ।
दृष्टा: श्रुता वा यदव: स्वपुर्यां सुखमासते ॥ ११ ॥
अनुवाद
चाचाजी, आपने द्वारका के भी दर्शन किए होंगे? उस पवित्र स्थान में हमारे मित्र और शुभचिंतक यदुवंशी रहते हैं। वो भगवान श्रीकृष्ण की सेवा में हमेशा तत्पर रहते हैं। आप उनकी मुलाकात ज़रूर की होगी या उनके बारे में सुना होगा? वो अपने -अपने घरों में सुखपूर्वक रह रहे हैं न?
O uncle, you must have been to Dwaraka as well? In that holy place are our friends and well-wishers of the Yadu dynasty, who are always engaged in the service of Lord Krishna. You must have met them or heard about them? They are living happily in their respective homes, aren't they?
तात्पर्य
विशिष्ट शब्द कृष्ण-देवताः, यानी जो हमेशा प्रभु कृष्ण की सेवा में लिप्त रहते हैं, महत्वपूर्ण है। यादव और पाण्डव, जो हमेशा प्रभु कृष्ण के विचार और उनकी विभिन्न दिव्य गतिविधियों में लिप्त रहते थे, वे सब विदुर की तरह ही प्रभु के शुद्ध भक्त थे। प्रभु की सेवा के लिए खुद को पूरी तरह से समर्पित करने के लिए विदुर ने घर छोड़ दिया था, लेकिन पाण्डव और यादव हमेशा प्रभु कृष्ण के विचार में लिप्त रहते थे। इस प्रकार उनके शुद्ध भक्ति भाव में कोई अंतर नहीं है। या तो घर पर रहना या घर छोड़ना, एक शुद्ध भक्त की वास्तविक योग्यता कृष्ण के विचार में अनुकूल रूप से लिप्त होना है, अर्थात यह भली-भांति जानना कि प्रभु कृष्ण ही परमेश्वर हैं। कंस, जरासंध, शिशुपाल और उनके जैसे अन्य राक्षस भी हमेशा प्रभु कृष्ण के विचार में लिप्त रहते थे, लेकिन वे अलग तरीके से लिप्त थे, अर्थात् प्रतिकूल रूप से, या उन्हें केवल एक शक्तिशाली व्यक्ति समझते थे। इसलिए, कंस और शिशुपाल विदुर, पाण्डव और यादव जैसे शुद्ध भक्तों के समान स्तर पर नहीं हैं। महाराज युधिष्ठिर भी हमेशा द्वारका में प्रभु कृष्ण और उनके सहयोगियों के विचार में लिप्त रहते थे। अन्यथा वह उन सबके बारे में विदुर से नहीं पूछ सकते थे। इसलिए महाराज युधिष्ठिर विदुर के समान भक्ति के स्तर पर थे, हालाँकि वे विश्व के राज्य के राज्य कार्यों में लगे हुए थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥