महाराज युधिष्ठिर के कृत्यों से सबक लेना चाहिए। वह युद्ध के मैदान पर किए गए पापों से डरते थे, और इसलिए वह सर्वोच्च अधिकार को संतुष्ट करना चाहते थे। यह इंगित करता है कि अनजाने में हमारे दैनिक व्यावसायिक कर्तव्यों के निर्वहन में भी पाप किए जाते हैं, और इस तरह के अनजाने अपराधों का प्रतिकार करने के लिए, व्यक्ति को यज्ञ करना चाहिए जैसा कि प्रकट शास्त्रों में अनुशंसित किया गया है। भगवान भगवद-गीता में कहते हैं (यज्ञार्थ कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्म-बंधनः) कि सभी अनधिकृत कार्यों की प्रतिबद्धताओं, या यहां तक कि अनजाने अपराध जो कि हम करने वाले होते हैं, से छुटकारा पाने के लिए शास्त्रों में अनुशंसित यज्ञ किए जाने चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाएगा। और जो लोग ऐसा नहीं करते बल्कि स्वार्थ या इंद्रिय सुख के लिए कार्य करते हैं, उन्हें किए गए पापों से मिलने वाले सभी कष्टों से गुजरना पड़ता है। इसलिए, यज्ञ करने का मुख्य उद्देश्य सर्वोच्च व्यक्तित्व हरि को संतुष्ट करना है। यज्ञ करने की प्रक्रिया अलग-अलग समय, स्थान और व्यक्तियों के संदर्भ में भिन्न हो सकती है, लेकिन इस तरह के यज्ञों का उद्देश्य हर समय और सभी परिस्थितियों में एक ही होता है, अर्थात सर्वोच्च भगवान हरि की संतुष्टि। यही पवित्र जीवन का मार्ग है, और यही बड़े पैमाने पर दुनिया में शांति और समृद्धि का मार्ग है। महाराज युधिष्ठिर ने दुनिया के आदर्श पवित्र राजा के रूप में ये सब किया।
यदि महाराज युधिष्ठिर राजकीय प्रशासन के अपने दैनिक कर्तव्यों के निर्वहन में पापी हैं जिसमें मनुष्य और पशुओं की हत्या एक मान्यता प्राप्त कला है, तो हम कल्पना कर सकते हैं कि कलियुग की अप्रशिक्षित आबादी द्वारा कितने पाप किए गए हैं जिनके पास सर्वोच्च भगवान को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करने का कोई तरीका नहीं है। इसलिए भागवतम कहता है कि मानव का मुख्य कर्तव्य अपने व्यावसायिक कर्तव्य के पालन से सर्वोच्च भगवान को संतुष्ट करना है (भागवत 1.2.13)।
किसी भी स्थान या समुदाय के किसी भी व्यक्ति, जाति या संप्रदाय द्वारा किसी भी प्रकार के व्यवसायिक कर्म में लिप्त हो, लेकिन उसे त्याग करने के लिए सहमत होना चाहिए क्योंकि यह शास्त्रों में विशेष स्थान, समय और व्यक्ति के लिए अनुशंसित है। वैदिक साहित्य में यह सिफारिश की गई है कि कलियुग में लोग बिना अपराध के कृष्ण के पवित्र नाम का जप करके भगवान की महिमा करें (कीर्तनाद एव कृष्णस्य मुक्ता संगः परम व्रजेट)। ऐसा करने से व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो सकता है और इस प्रकार गृह लौटकर भगवान के पास लौटकर जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर सकता है। हम इस महान साहित्य में पहले ही एक से अधिक बार इस पर चर्चा कर चुके हैं, विशेष रूप से प्रस्तावना भाग में भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवन को रेखांकित करके, और फिर भी हम समाज में शांति और समृद्धि लाने के लिए इसे दोहरा रहे हैं।
भगवान ने भगवद-गीता में खुले तौर पर घोषणा की है कि वह कैसे हमसे प्रसन्न होते हैं, और यही प्रक्रिया व्यावहारिक रूप से भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवन और प्रचार कार्य में प्रदर्शित होती है। सर्वोच्च भगवान हरि (भगवान का व्यक्तित्व, जो हमें अस्तित्व के सभी दुखों से मुक्त करता है) को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ या बलिदान करने की सही प्रक्रिया इस कलह और मतभेद के अंधेरे युग में भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के मार्गों का अनुसरण करना है।
महाराजा युधिष्ठिर को यज्ञों में घोड़े की बलि के लिए साज-सामान सुरक्षित करने के लिए बहुत सारा सोना इकट्ठा करना पड़ा, इसलिए हम इस कमी और सोने की पूर्ण कमी के इन दिनों में यज्ञों के ऐसे प्रदर्शन के बारे में शायद ही सोच सकते हैं। वर्तमान समय में हमारे पास आधुनिक सभ्यता के आर्थिक विकास द्वारा सोने में बदलने के कागजों और वादों के ढेर हैं, और फिर भी महाराजा युधिष्ठिर जैसे धन को व्यक्तिगत रूप से या सामूहिक रूप से या राज्य के संरक्षण द्वारा खर्च करने की कोई संभावना नहीं है। इसलिए, युग के लिए उपयुक्त शास्त्र के संदर्भ में भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा अनुशंसित विधि है। ऐसी विधि में बिल्कुल भी खर्च की आवश्यकता नहीं होती है और फिर भी यज्ञ प्रदर्शनों के अन्य महंगे तरीकों की तुलना में अधिक लाभ प्रदान कर सकती है।
वैदिक विनियमों द्वारा किए गए घोड़े की बलि यज्ञ या गाय की बलि यज्ञ को जानवरों को मारने की प्रक्रिया के रूप में गलत नहीं समझा जाना चाहिए। इसके विपरीत, यज्ञ के लिए चढ़ाए गए जानवरों को वैदिक मंत्रों के उच्चारण की पारलौकिक शक्ति द्वारा जीवन के एक नए काल तक फिर से जीवंत कर दिया गया, जो कि यदि ठीक से जप किया जाता है, तो सामान्य व्यक्ति द्वारा समझा जाता है। वेद-मंत्र सभी व्यावहारिक हैं, और प्रमाण बलिदान किए गए जानवर का कायाकल्प है। वर्तमान युग के तथाकथित ब्राह्मणों या पुजारियों द्वारा वैदिक मंत्रों के इस तरह के पद्धतिगत जप की कोई संभावना नहीं है। दो बार जन्मे परिवारों के अप्रशिक्षित वंशज अब अपने पूर्वजों की तरह नहीं रहे, और इस प्रकार उन्हें शूद्रों या एक बार जन्म लेने वाले लोगों में गिना जाता है। एक बार जन्म लेने वाला व्यक्ति वैदिक मंत्रों का उच्चारण करने के लिए अयोग्य होता है, और इसलिए मूल मंत्रों का उच्चारण करने की कोई व्यावहारिक उपयोगिता नहीं है।
और उन सभी को बचाने के लिए, भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए कीर्तन आंदोलन या यज्ञ का प्रतिपादन किया, और वर्तमान युग के लोगों को इस निश्चित और मान्यता प्राप्त मार्ग का पालन करने की दृढ़ता से अनुशंसा की जाती है।
