श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.12.27 
तक्षकादात्मनो मृत्युं द्विजपुत्रोपसर्जितात् ।
प्रपत्स्यत उपश्रुत्य मुक्तसङ्ग: पदं हरे: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण के बेटे द्वारा भेजे गए तक्षक नाग के काटने से अपनी मौत के बारे में सुनकर, वह सभी भौतिक मोह से मुक्त हो जाएगा और भगवान को आत्मसमर्पण करके उनकी शरण में चला जाएगा।
 
Having heard that he will die from the bite of the Takshak serpent sent by the brahmin's son, he will free himself from all material attachments and surrender himself to the Lord and take refuge in Him.
तात्पर्य
भौतिक आसक्ति और भगवान के चरण-कमलों का आश्रय लेना साथ-साथ नहीं चल सकता। भौतिक आसक्ति का मतलब भगवान के आश्रय में पारलौकिक सुख की अज्ञानता है। भौतिक संसार में रहते हुए भगवान को की गई भक्ति सेवा, भगवान के साथ अपने पारलौकिक संबंध के अभ्यास का एक तरीका है, और जब यह परिपक्व हो जाती है, तो व्यक्ति सभी भौतिक आसक्तियों से पूरी तरह मुक्त हो जाता है और स्वर्ग वापस जाने के लिए सक्षम हो जाता है। महाराजा परीक्षित, अपनी माँ के गर्भ में अपने शरीर की शुरुआत से ही भगवान से विशेष रूप से जुड़े हुए थे, वह लगातार भगवान के आश्रय में थे, और ब्राह्मण के बेटे के शाप की तारीख से सात दिनों के भीतर उनकी मृत्यु की तथाकथित चेतावनी उनके लिए एक वरदान थी ताकि वह खुद को स्वर्ग वापस जाने, वापस परमात्मा के लिए तैयार कर सकें। चूँकि भगवान ने हमेशा उनकी रक्षा की थी, वह भगवान की कृपा से इस शाप के प्रभाव को टाल सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा कोई अनुचित लाभ बिना वजह नहीं उठाया। बल्कि, उन्होंने एक बुरे सौदे का सर्वोत्तम उपयोग किया। लगातार सात दिनों तक उन्होंने सही स्रोत से श्रीमद-भागवतम सुना, और इस प्रकार उन्हें उस अवसर से भगवान के चरण-कमलों का आश्रय मिला।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)