श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.12.25 
धृत्या बलिसम: कृष्णे प्रह्राद इव सद्ग्रह: ।
आहर्तैषोऽश्वमेधानां वृद्धानां पर्युपासक: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
यह बालक धैर्यवान होगा जैसे बलि महाराज थे और अनन्य भक्त होगा जैसे प्रह्लाद महाराज थे। वह अनेक अश्वमेध यज्ञ करेगा तथा वृद्ध और अनुभवी व्यक्तियों की सलाह का पालन करेगा।
 
This child will be like Bali Maharaja in patience and like Prahlada Maharaja, an exclusive devotee of Krishna. He will perform many Ashwamedha sacrifices and will be a follower of old and experienced persons.
तात्पर्य
बाली महाराज: भगवान की भक्ति में बारह अधिकारियों में से एक। बाली महाराज भक्ति सेवा में एक महान अधिकारी हैं क्योंकि उन्होंने प्रभु को प्रसन्न करने के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया और अपने तथाकथित आध्यात्मिक गुरु के बंधन को त्याग दिया जिन्होंने प्रभु की सेवा के लिए सब कुछ त्यागने के मार्ग में बाधा डाली। धार्मिक जीवन की सर्वोच्च पूर्णता बिना किसी कारण या किसी भी प्रकार के सांसारिक दायित्व से बाधित हुए भगवान की अयोग्य भक्ति सेवा की स्थिति प्राप्त करना है। बाली महाराज भगवान की संतुष्टि के लिए सब कुछ त्यागने के लिए दृढ़ थे, और उन्हें किसी भी अवरोध की परवाह नहीं थी। वह प्रह्लाद महाराज के पोते हैं, जो भगवान की भक्ति सेवा में एक और अधिकारी हैं। बाली महाराज और विष्णु वामनदेव के साथ उनके व्यवहार का इतिहास श्रीमद-भागवतम (अध्याय 11-24) के आठवें कांड में वर्णित है।

प्रह्लाद महाराज: भगवान कृष्ण (विष्णु) के एक आदर्श भक्त। उनके पिता, हिरण्यकश्यपु ने उन्हें केवल पाँच वर्ष की आयु में कठोर दंड दिया था जब वह भगवान के अद्वितीय भक्त बन गए थे। वह हिरण्यकश्यपु के पहले पुत्र थे, और उनकी माता का नाम कायाधु था। प्रह्लाद महाराज भगवान की भक्ति सेवा में एक अधिकारी थे क्योंकि उन्होंने अपने पिता की भगवान नृसिंहदेव से हत्या करवा दी थी, यह उदाहरण स्थापित करते हुए कि यदि ऐसा पिता भक्ति सेवा के मार्ग में बाधा हो तो उसे भी हटा देना चाहिए। उनके चार पुत्र थे, और सबसे बड़े पुत्र, विरोचन, ऊपर उल्लिखित बाली महाराज के पिता हैं। प्रह्लाद महाराज के कार्यों का इतिहास श्रीमद-भागवतम के सातवें कांड में वर्णित है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)