यायाति: संसार के महाभारत सम्राट और आर्य तथा इंडो-यूरोपीय जाति से संबंध रखने वाले संसार के सभी बड़े राज्यों के मूल पुरखा है। वे महाराज नहुष के पुत्र हैं और वे अपने बड़े भाई के महात्मा और मुक्त संत हो जाने से संसार के सम्राट बने। उन्होंने हज़ारों वर्षों तक संसार पर राज्य किया और इतिहास में अनेक यज्ञ व पुनीत कार्य किए, यद्यपि उनका प्रारंभिक काल कामुकता से भरा हुआ था और काम क्रीडाओं की कहानियों से पूर्ण था। उसे शुक्राचार्य की प्रिय पुत्री देवयानी से प्रेम हो गया। देवयानी उससे विवाह करना चाहती थी, किंतु शुरू में उन्होंने ब्राह्मण कन्या होने के कारण उसे स्वीकार करने से मना कर दिया। शास्त्रों के अनुसार, ब्राह्मण ब्राह्मण कन्या से ही विवाह कर सकता था। वे विश्व में वर्ण-संकर की जनसंख्या को लेकर बहुत सावधान थे। शुक्राचार्य ने इस वर्जित विवाह के नियम में संशोधन करके सम्राट यायाति को देवयानी को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। देवयानी की एक सहेली शर्मिष्ठा थी, जिसे भी सम्राट से प्रेम हो गया और इसलिए वह अपनी सहेली देवयानी के साथ रहने लगी। शुक्राचार्य ने सम्राट यायाति को शर्मिष्ठा को अपने शयनकक्ष में बुलाने से मना किया, किंतु यायाति उनके आदेश का पूरी तरह से पालन नहीं कर सके। उन्होंने गुप्त रूप से शर्मिष्ठा से भी विवाह कर लिया और उसके द्वारा पुत्र उत्पन्न किए। जब देवयानी को इस बात की जानकारी मिली, तो वह अपने पिता के पास गई और शिकायत दर्ज कराई। यायाति देवयानी से बहुत जुड़े हुए थे और जब वह उसे बुलाने अपने ससुराल गया, तो शुक्राचार्य उनसे नाराज़ हो गए और उन्हें नपुंसक होने का शाप दे दिया। यायाति ने अपने ससुर से अपने श्राप को वापस लेने की विनती की, किंतु ऋषि ने यायाति से अपने पुत्रों से उनका यौवन मांगने और उनकी शर्त के अनुसार उन्हें बूढ़ा हो जाने देने को कहा। यायाति के पांच पुत्र थे, दो देवयानी से और तीन शर्मिष्ठा से। उनके पांच पुत्रों, अर्थात (1) यदु, (2) तुर्वसु, (3) द्रुह्यु, (4) अनु और (5) पुरु से, पाँच प्रसिद्ध राजवंशों, अर्थात (1) यादव वंश, (2) यवन (तुर्क) वंश, (3) भोज वंश, (4) म्लेच्छ वंश (ग्रीक) वंश, और (5) पौरव वंश का उदय हुआ, सभी संसार में फैलने के लिए उत्पन्न हुए। वे अपने पुनीत कर्मों के कारण स्वर्गीय लोक पहुँचे, किंतु अपने आत्म-प्रचार और अन्य महात्माओं की आलोचना करने के कारण वह वहाँ से गिर गए। गिरने के बाद, उनकी पुत्री और पौत्र ने अपने संचित पुण्यों को उन्हें प्रदान कर दिया, और अपने पौत्र व मित्र शिबि की सहायता से, वह फिर से स्वर्गीय राज्य में चले गए, यमराज की सभा के सदस्य में से एक बन गए, जिसके साथ वे एक भक्त के रूप में रह रहे हैं। उन्होंने एक हज़ार से भी अधिक विभिन्न यज्ञ किए, उदारतापूर्वक दान दिया और बहुत प्रभावशाली राजा थे। उनकी राजसी शक्ति का संसार में हर जगह एहसास था। उनके सबसे छोटे पुत्र ने उन्हें अपना यौवन देने के लिए सहमति जताई जब वह एक हज़ार वर्षों के लिए भी कामुक इच्छाओं से परेशान थे। अन्ततः वह सांसारिक जीवन से विरक्त हो गए और अपने पुत्र पुरु को यौवन वापस कर दिया। वह राज्य की कमान पुरु को सौंपना चाहते थे, किंतु उनके रईस और प्रजा सहमत नहीं थे। किंतु जब उन्होंने अपने प्रजा को पुरु की महानता समझाई, तो वे पुरु को राजा के रूप में स्वीकार करने के लिए सहमत हो गए, और ऐसे सम्राट यायाति ने पारिवारिक जीवन से संन्यास ले लिया और घर छोड़कर वन के लिए निकल पड़े।
