श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.12.23 
पितामहसम: साम्ये प्रसादे गिरिशोपम: ।
आश्रय: सर्वभूतानां यथा देवो रमाश्रय: ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
यह बालक मन की समता में अपने पितामह युधिष्ठिर या फिर ब्रह्मा की तरह होगा। दानशीलता में कैलाशपति शिव के समान होगा। यह देवी लक्ष्मी के भी आश्रय, भगवान नारायण के समान सबको आश्रय देने वाला होगा।
 
This child will be like his grandfather Yudhishthira or Brahma in his equanimity of mind. In his generosity, he will be like Shiva, the lord of Kailash. He will be the shelter of Goddess Lakshmi and like Lord Narayana, he will be a shelter for everyone.
तात्पर्य
मानसिक समता का सम्बन्ध महाराज युधिष्ठिर और सभी जीवों के पितामह ब्रह्मा दोनों से है। श्रीधर स्वामी के अनुसार, यहाँ पितामह का तात्पर्य ब्रह्मा से है, पर विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, पितामह स्वयं महाराजा युधिष्ठिर है। पर दोनों ही दशाओं में यह उपमान समान रूप से श्रेष्ठ है क्योंकि दोनों ही परमेश्वर के प्रतिष्ठित प्रतिनिधि है, और इस प्रकार जीवों के कल्याण के लिए कार्यरत रहते हुए, दोनों को मानसिक समता बनाये रखनी होती है। प्रशासन के शीर्ष पर बैठा कोई भी जिम्मेदार कार्यकारी अधिकारी उन व्यक्तियों से अलग-अलग प्रकार के आघात सहन करता है, जिनके लिए वह कार्य करता है। ब्रह्मा जी की आलोचना भगवान् की परम सिद्धावस्था की भक्त गोपियों ने भी की थी। गोपियाँ ब्रह्मा जी के कार्य से इसलिये असन्तुष्ट थीं क्योंकि भगवान् ब्रह्मा ने, इस विशिष्ट ब्रह्मांड के सृजनकर्ता होने के नाते, पलकें बनायी, जिससे भगवान कृष्ण को देखने में रुकावट पड़ती थी। वे पलक झपकने के एक क्षण को भी सहन नहीं कर सकती थीं, क्योंकि इससे वे अपने प्रिय भगवान् कृष्ण को देखने से वंचित हो जाती थीं। तो फिर दूसरों की बात क्या करें, जोकि स्वाभाविक रूप से एक ज़िम्मेदार व्यक्ति के प्रत्येक कार्य की आलोचना करते हैं? इसी तरह, महाराजा युधिष्ठिर को अपने शत्रुओं द्वारा निर्मित अनेकों कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा, और सभी विषम परिस्थितियों में वे मानसिक समता बनाए रखने वाले सबसे परिपूर्ण पुरुष सिद्ध हुए। अत: मन की समता बनाए रखने के लिए दोनों पितामहों का उदाहरण बिलकुल उचित है। भगवान् शिव एक विख्यात देवता है जो भिखारियों को दान देते हैं। अत: उनका नाम आशुतोष है, या वह जो बड़ी आसानी से संतुष्ट हो जाते हैं। उन्हें भूतनाथ भी कहते हैं, या साधारण लोगों के स्वामी, जोकि उनके उदार उपहारों के कारण उनसे जुड़े रहते हैं, भले ही वे इसके परिणामों की परवाह नहीं करते। रावण भगवान् शिव से बहुत जुड़ा हुआ था, और उन्हें आसानी से प्रसन्न करके, रावण इतना शक्तिशाली बन गया कि वह भगवान् राम के अधिकार को चुनौती देना चाहता था। निश्चित रूप से, जब रावण ने भगवान् राम से युद्ध किया, जोकि भगवान् के भगवान् और भगवान् शिव के भी भगवान् हैं, तब भगवान् शिव ने रावण की कभी सहायता नहीं की। वृकासुर को, भगवान् शिव ने एक वरदान दिया जो न केवल विचित्र था, बल्कि परेशान करने वाला भी था। भगवान् शिव की कृपा से वृकासुर को किसी का भी सिर मात्र स्पर्श करके उसे गायब करने की शक्ति प्राप्त हो गयी। हालाँकि यह वरदान भगवान् शिव ने दिया था, पर वह चालाक वृकासुर शिव जी के सिर को छू कर अपनी शक्ति का परीक्षण करना चाहता था। इस प्रकार, स्वयं को मुसीबत से बचाने के लिए शिव जी को विष्णु जी की शरण लेनी पड़ी और भगवान् विष्णु ने अपनी माया शक्ति से वृकासुर को अपने ही सिर पर प्रयोग करने के लिए कहा। उसने ऐसा ही किया और उसका स्वयं अंत हो गया, और इस तरह देवताओं के एक ऐसे चालाक भिखारी से संसार को सभी मुसीबतों से मुक्ति मिल गयी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भगवान् शिव ने कभी किसी को भी कोई भी उपहार देने से मना नहीं किया। अत: वे सबसे उदार है, यद्यपि कभी-कभी कुछ प्रकार की गलती हो जाती है। रमा का अर्थ है भाग्य की देवी। और उनके शरणदाता भगवान् विष्णु हैं। भगवान् विष्णु सभी जीवों के पालनकर्ता हैं। न केवल इस ग्रह की सतह पर बल्कि अन्य हजारों ग्रहों पर भी असंख्य जीव है। उन सभी को आत्म-साक्षात्कार के अंतिम मार्ग के लिए जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है, पर भोग विलास के मार्ग पर उन्हें माया, भ्रामक ऊर्जा के माध्यम से कठिनाइयों में डाल दिया जाता है, और इस तरह आर्थिक विकास की एक झूठी योजना का अनुसरण करते रहते हैं। ऐसा आर्थिक विकास कभी भी सफल नहीं होता क्योंकि यह भ्रामक है। ये मनुष्य सदैव भ्रामक भाग्य की देवी की दया के पात्र होते हैं, पर वे यह नहीं जानते कि भाग्य की देवी केवल विष्णु के संरक्षण में ही रह सकती है। विष्णु के बिना, भाग्य की देवी एक भ्रम ही है। अत: हमें सीधे भाग्य की देवी के संरक्षण की तलाश के बजाय विष्णु के संरक्षण की तलाश करनी चाहिए। सभी को केवल विष्णु और विष्णु के भक्त ही संरक्षण दे सकते हैं, और क्योंकि महाराजा परीक्षित स्वयं विष्णु द्वारा संरक्षित थे, अत: उन सभी को पूर्ण संरक्षण देना उनके लिए संभव था जो उनके शासन में रहना चाहते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)